जहर खुराक और दवाई का कन्फ्यूजन

हरियाणा के जिला कैथल के कैलरम गांव में 25 अगस्त 2019 को दादा खेड़े पर एक बैठक चल रही थी और बैठक में एक सीनियर किसान महोदय जी के रंगे हाथ अलग से नज़र आ गए जो खेत में जहर छिड़क कर आने के बाद मीटिंग में बैठे थे। मैंने विनम्रता से उन्हें आगे बुलाया और पूछा कि इतनी लापरवाही किस लिए। मैंने अमित भाई से निवेदन किया कि फोटो खींच लें तो तुरंत किसान महोदय जी ने मेरे से उन्होंने फोटो किसी को न दिखाने को कहा। (फोटो को इसी लिए क्रॉप कर दिया गया है)

बात चली के जब बोतल पर थैली पर कट्टे पर साफ़ लिखा है कि जहर है, हर भाषा में लिखा है, पढ़ लिख न सकने वालों के लिए निशान बनाये हैं। फिर भी ऐसी लापरवाही क्यों। मैंने वहां मीटिंग में बैठे सभी किसानों से सवाल किया कि ताऊ के हाथ मे क्या लगा है सबने कहा दवाई, एक एक से पूछा क्या है , सबका जवाब आया दवाई

मेरे मन मे से आवाज आई असली रौला यहीं हैं?

बात आगे चली खुराक दवाई और जहर तीनो अलग अलग चीजें हैं। हम जहर को दवाई समझ कर यूज करते हैं, अपनी बोलचाल की भाषा मे भी दवाई कहते हैं जबकि उसके ऊपर साफ साफ जहर लिखा हुआ है।शब्दों का यह हेर फेर हमें लापरवाह बना देता है और हम गलती करने लगते हैं।

यदि हम जहर को जहर बोलें तो हमारे हाथ कापेंगे यूज करते हुए। यदि हम अपने घर में ऐसे बोलें कि मैं जा रहा हूँ जहर लेने, मैं जहर ले आया , यहाँ जहर रखा है और मै खेत में जहर डालने जा रहा हूँ, मै जहर डाल आया, ऐसा करने से हमारा हाथ हर जगह रुकेगा और हम जहर का उपयोग कम से कम ही करेंगे

हमारी सारी पढ़ाई लिखाई और वैज्ञानिकता बेकार है यदि ग्रासरूट्स पर यह स्थिति है। ग्रामीणों ने कहा कि हम इन्हीं हाथों से सभी कार्य कर लेते हैं। नतीजे इतने गंभीर हैं कि वहीं दादा खेड़ा के चबूतरे पर मुझे चार पांच बच्चे मानसिक रूप से कमज़ोर दिखाई दे गए। गांव में और भी होंगे।काम बहुत अधिक पड़ा है करने को।

सभी को करना पड़ेगा थोड़ा थोड़ा और जो जहां बैठा है वहीं करना पड़ेगा।