चौधरी खरताराम जाखड़ Kharta Ram Jakhar

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देश काल और परिस्थितियों का चक्कर अनवरत चलता रहता है। व्यक्ति के सामने उसी अनुरूप अनेक समस्यायें, चुनौतियां आती रहती है। अधिकांश लोग तो इन बाधाओं से समझौता कर लेते है और इन्हीं चुनौतियों के गुलाम होकर जीवन व्यतीत कर अतीत के गर्त में समा जाते है किन्तु कुछ लोग ऐसे भी होते है जो इन बाधाओं को चुनौतियों के रूप में स्वीकार कर इनसे जूझने का काम करते है और इनमें संशोधन, परिवर्तन कर जन सामान्य के लिये सुलभ बना देते है। ऐसे व्यक्ति, व्यक्तिगत भावना से ऊपर उठकर संपूर्णता की बात करते है और उसी चितंन में अपना जीवन होम कर अमर हो जाते है।

चौधरी खरतारामजी (Kharta Ram Jakhar) उन्हीं महापुरुषों में से एक थे। बचपन में चौधरी साहब को क्षेत्र मे व्याप्त प्राकृतिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और साम्प्रदायिक समस्याओं से सामना करना पड़ा। इन्हीं समस्याओं से जूझते हुए खरताराम जी तपकर ऐसे कुंदन बने कि आज भी लोग उन्हें श्रद्धा से याद करते है। मारवाड़ में इन समस्याओं में से एक मुख्य समस्या थी डकैती की।

जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि उस समय सामन्तवाद का बोलबाला था और सामन्त येन-केन-प्रकरेण किसानों को हर प्रकार से दबाने का प्रयास करते थे। सामंत, बेगार आदि से किसानों को परेशान करते थे। असल में किसान इतने डरते थे कि सामन्तों के सामने बोलने की हिम्मत ही नहीं करते और यदि कोई किसान सामन्तवादी ताकतों के सामने जुबान खोलने की हिम्मत कर ही लेता तो उस किसान पर जुल्मों के पहाड़ ढहाये जाते थे। अंतिम हथियार के तौर पर सामन्त उस किसान को डकैतों को कहलाकर डाका डलवा देते थे। उस समय किसान के पास मुख्य रूप से ऊंट, गायें, भेड़-बकरियों का रेवड़, घी या ऊनी वस्त्र होते थे। ऊंट तो उस समय के किसानों की जीवन रेखा ही होता था। वह किसान का सुख-दुःख का साथी था। वह हर समय किसान का साथ देता था।

भणियाणा के पास ही सांकड़ा नामक क्षेत्र इस प्रकार के डकैतों का एक मुख्य अड्डा था। कहा जाता है कि सांकड़ा के एक कुएं का पानी गुटकी (बच्चे के जन्म के बाद पहली घूंट) में पीने वाला बच्चा बड़ा होकर डकैत बनता था। इसी सांकड़ा गांव का एक डकैत ऊमपुरी (ओमपुरी) स्वामी था। उसने क्षेत्र के सामन्ती किस्म के लोगों के साथ मिलकर एक डकैत गिरोह बना लिया। वह गिरोह न केवल पोखरण क्षेत्र अपितु बाड़मेर, जोधपुर, जैसलमेर, पाली और यहां तक कि गुजरात और मालवा तक डाका डालता था।

रातड़िया और भणियाणा जाट बाहुल्य क्षेत्र थे। इन गांवों पर इन डकैतों की खास करके नजर रहती थी। ये डकैत गिरोह राज के नजदीकी लोगों में डकैती नहीं करते थे। वहां से इन गिरोहों को शरण मिलती थी। यह संवत् 2007 की बात है। एक बार ऊमपुरी का डकैत गिरोह रातड़िया गांव में एक जाट के घर में डाका डालने गया। इन डकैतों ने पहले से ही उस परिवार को लूटने की धमकी दे रखी थी। संयोग कहें या दुर्योग, उस दिन उस घर में परिवार के किसी सदस्य की मौत हो गयी थी। रात्रि को जिस समय डकैत गिरोह डाका डालने गया, उस समय लाश घर के आंगन के बीच में पड़ी थी और ऊपर सफेद कफन था। कुछ लोग वहां गमगीन परिवार के साथ बैठे मातम मना रहे थे।

डकैत सरगना ऊमपुरी ने बाहर खड़े ही आवाज मारी कि घर में कोई हो क्या ? तब वहां पर बैठे लोगों ने कहा कि हां। तब डकैत ने घर के मुखिया का नाम लेते हुए उसे बाहर आने को कहा। डकैत उसे मारना या पीटना चाहता था। तब वहां बैठे लोगों ने कहा कि इस घर में ‘कुजोग’ (किसी भी प्रकार की अशुभ घटना को मारवाड़ में कुजोग बोला जाता है।) हो गया है। तब भी उन डकैतों को विश्वास नहीं हुआ। ऊमपुरी खुद आंगन में आया तो उसने देखा कि वास्तव में आंगन में कपड़े से ढ़काकुछ पड़ा है और कुछ लोग पास में बैठे है, तो भी उसे विश्वास नहीं हुआ कि कहीं ये नाटक तो नहीं कर रहे है ताकि लुटने से बच सके। तब निर्दयी डकैत ने लाठी से उस कफन को हटाया तो देखा कि वास्तव में उसके नीचे आदमी तो है। फिर भी उसने लाठी से उस लाश को सरकाया कि कहीं बचने के लिये ये ढ़ोंग तो नहीं कर रहे है। इतने निर्दयी थे ये डकैत कि जिन्दे इंसान को तो क्या, वे किसान की लाश तक को चैन से आंगन में पड़ी नहीं रहने देते थे ।

इस प्रकार की दुर्दान्त घटनायें ये डकैत करते थे। यदि इन डकैतों से उनके पक्ष का कोई आदमी जाकर शिकायत कर देता कि अमुक किसान ने उन्हें खाना नहीं खिलाया या फिर कोई चीज मांगने पर नहीं दी तो ये उस किसान को लूट लेते थे। इन डकैतों को तो कोई न कोई बहाना ही चाहिये था। ये दल गरीब किसानों से धन लूटकर दावतें करते थे। इनसे सब डरते थे। किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि इनके सामने या इनके खिलाफ एक शब्द भी बोल दे। कोई मामूली चोर भी किसी गांव में या किसी घर में आकर यह कह देता कि ऊमपुरी ने खाने का राशन और ऊंटों के लिये चारा मंगाया हैं, तो किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि वे मना कर दे। सारी सामग्री उसे देनी पड़ती थी ।

चूंकि खरताराम आर्थिक तौर पर असक्षम थे तो वे बारहठों का रेवड़ चराते थे। एक बार किसी बारहठ जी ने कहा कि उसके बैल चैत्री मेले (तिलवाड़ा पशु मेला, बालोतरा के पास पहुंचाना है। उस समय चैत्री मेला पूरे राजस्थान में प्रसिद्ध पशु मेला था। यहां पर न केवल राजस्थान अपितु अन्य राज्यों के व्यापारी भी पशुओं की खरीद-फरोख्त के लिये आते थे। खरताराम जी वे बैल लेकर चैत्री मेले चले गये। वहां पर किसान केसरी बलदेवराम मिर्धा का भाषण सुना। उस समय इन मेलों में अक्सर किसान नेता शिरकत कर किसानों को जागृति और शिक्षा की बातें बताते थे। इससे धुन के धनी खरताराम जी के मन में जागृति के भाव आये। इस क्षेत्र के हजारों किसान इन मेलों में मवेशी लेकर खरीद-फरोख्त के लिये आते थे। नाथूराम जी मिर्धा ने एक साक्षात्कार में इन मेलों के बारे में कहा था कि इन मेलों में क्षेत्र के जितने किसानों से बात हो जाती है, उतने किसानों से मिलना तो हजारों रुपये का पैट्रोल जलाकर भी नहीं हो पाता।

मेले में बलदेवराम जी मिर्धा आदि किसान नेताओं के भाषण सुनने से खरताराम जी (Kharta Ram Jakhar) के मन में विचार आया कि हमें भी जागना चाहिये। उसी दिन वह बलदेवराम जी मिर्धा से मिले और पोखरण परगने में होने वाले अत्याचारों की जानकारी उन्हें दी। मिर्धा साहब ने उन्हें अपना जोधुपर का पता बताया और कहा कि मेरे से मिलते रहना ।

उसके बाद खरताराम जी मिर्धा जी से मिलने के लिये जोधपुर गये और पोकरण परगने के किसानों की हालात तथा जागीरदारों व डकैतों के अत्याचारों की स्थिति से अवगत करवाया। इसके बाद आप नाथूराम जी मिर्धा के संपर्क में आये। इसके बाद वह मिर्धा जी के हमेशा संपर्क में रहे। मिर्धाजी ने आपको सलाह दी कि आप भणियाणा में सहकारिता की दुकान खोल दो। वहां से कपड़ा, अनाज आदि सस्ता मिलेगा, जिससे गरीब किसानों को फायदा होगा।

इस सलाह के अनुसार आपने सन् 1946 (संवत् 2003) में भणियाणा ग्राम सहकारी समिति की स्थापना की। गांव मुख्यालय पर उस समय ज्यादा आबादी नहीं थी। सारे किसान अपने खेतों में ढाणियां बनाकर रहते थे। इसलिये आपने दुकान की सुरक्षा के लिहाज से प्रहलादोणी गोदारों की ढाणी में यह सहकारी दुकान खोली। साथ ही खरताराम जी ने भणियाणा, रातड़िया और आस-पास के किसानों से लगान नहीं देने की समझाईश भी करने लगे।

इससे वहां के वर्ग विशेष के लोग जल-भून गये। खरताराम जी और कुछ दबंग किसानों ने संवत् 2008 (सन् 1951) में जागीरदारों को लगान देना देना बंद कर दिया। इन किसानों में गुल्लाराम जी गोदारा, ऊदाराम जी गोदारा आदि मुख्य थे। कामदारों ने लगान चुकाने हेतु दबाव बनाया किन्तु ये लोग टस से मस नहीं हुए।

इसी समय उसे क्षेत्र में जालोर परगने के एक गांव से एक बारात आयी। इस बारात में बड़े-बड़े लोग शामिल भी शामिल हुए। इस विवाह में कई डकैत भी सम्मिलित हुए। राजगढ़ में कई डकैत थे। वहां पर पोकरण ठिकाने के ठिकानेदारों ने डकैतों से खरताराम जी की शिकायत की कि यह आदमी किसानों को भड़का रहा है। ये किसानों को बरगला कर लगान नहीं देने के लिये प्रेरित कर रहा है। ऐसी हालात में सारे किसान अपने विरोधी हो जायेंगे। वह जोधपुर में बलदेवराम मिर्धा से संपर्क में है। यह अब माहौल खराब करेगा। पानी नाक से ऊपर जाने लगे, उससे पहले ही इनका इलाज होना चाहिये। डकैतों को कहा कि किसी भी प्रकार से खरताराम को सबक सीखाना है। इससे डकैत खरताराम के खिलाफ हो गये।

कुछ दिनों बाद ऊमपुरी अपनी गैंग के साथ प्रहलादोणी गोदारों की ढाणी स्थित सोसायटी की दुकान पर गये और ऊंटों के लिये गुड़-फिटकरी मांगे। खरताराम जी ने कहा कि यह सामान तो यहां पर सोसायटी का है। बिना पैसे मैं दे नहीं सकता। तू-तू, मैं-मैं के बीच ऊमपुरी ने खरताराम को मारने के लिये बंदूक उठायी किन्तु वहीं ढाणी के गोदारों ने बीच-बचाव किया। डकैत गिरोह गोदारों को चेतावनी देकर गया कि यह दुकान यहां से उठवा देना नहीं तो अगली बार आने पर खरताराम और सहयोगियों को जीवित नहीं छोड़ेंगे। यह सन् 1950 (संवत् 2007) के किसी दिन की बात है।

कुछ दिनों बाद डकैत गिरोह बदला लेने और अपना चैलेंज पूरा करने के लिये सोसायटी की दुकान पर आ धमके। खरताराम जी दुकान पर ही थे। उन्होंने दूर से आते देखकर पहचान लिया कि यह ऊमपुरी का डकैत गिरोह आ रहा है और आज किसी भी हालत में जिन्दा नहीं छोड़ेगा। कहते है कि जाट अपनी बुद्धि को तुरंत काम में लेता है। वह एक फटा हुआ कुर्ता पहनकर और काले रंग की लोवड़ी ओढकर (विधवा महिला का वेश बनाकर) भेड़-बकरियों के रेवड़ के पीछे जाने लगे। उन्होंने गोदारों को कहा कि उन डकैतों को कहना कि खरताराम (Kharta Ram Jakhar) पोखरण गये है। डकैत गिरोह दुकान पर आया और गोदारों को पूछा कि खरताराम कहां है। तब उन्होंने कहा कि वह यहां है नहीं, पोखरण गये हुए है। ऊमपुरी ने कहा कि उसको कहना पैसे देने आये है, परन्तु वह मिला नहीं ।

उस दिन मानों डकैत खरताराम जी की हत्या करने के इरादे से ही आये हो। डकैत गिरोह खरताराम जी के पीछे पोखरण की तरफ गया और इधर खरताराम ने योजना बनाई कि अब इस गिरोह को खत्म करवाना है। आपने तय किया कि इस प्रकार के दस्युओं का खात्मा करना समाज के लिये आवश्यक है। नहीं तो ये डकैत न केवल मुझे बल्कि कई गरीबों को परेशान करेंगे। वह पैदल ही दूसरे रास्ते से पोखरण गये। वहां से भंवरसिंह को साथ लिया। भंवरसिंह भी ऊमपुरी से प्रताड़ित थे। पोकरण से ऊंट पर सवार होकर फलोदी थाने गये।

आपने फलोदी थाने जाकर सूचना दी कि ऊमपुरी का डकैत गिरोह भणियाणा में आया हुआ है। पुलिस दल ने मुकाबला करने की तैयारी की। उस समय पुलिस के पास हथियारों, मानव संसाधन और साधनों की भारी कमी रहती थी। दूसरे दिन दोपहर दो बजे पुलिस फोर्स ने डकैत गिरोह का पीछा करना शुरू किया। फलोदी से रमजान खां को साथ लिया। वह भी इस डकैत गिरोह से प्रताड़ित था । डकैत दल खरताराम के पीछे पोखरण जाने की फिराक में था किन्तु अपशुकन होने के कारण वे माड़वा गांव में एक ढाणी में रुक गये। दूसरी ओर खरताराम जी किसी ऊजड़ मार्ग से निकल कर पोखरण होते हुए फलोदी पहुंच गये।

डकैत सरगना ऊमपुरी ऊंट पर सवार होकर माडवा गांव की तरफ गये थे। यह ऊंट डकैत शिवगर बाबा से लूट कर ले गये थे। अब दिक्कत यह आ रही थी की डकैत के उस ढाणी में होने की पुष्टि कौन करे। पुलिस वाले भी उससे कांपते थे । तब खरताराम जी ने कहा कि मैं पता लगाता हूं कि डकैत कहां पर है ? उन्होंने उसके ऊंट के पदचिह्न वगैरह देखकर पूरी पुष्टि कर ली कि डकैत यहीं है। जिस समय खरताराम जी ने डकैत की टोह ली उस समय वह मांडवा गांव में एक पोखरण के घर में बैठा था। जब डकैत ऊमपुरी ने खरताराम जी (Kharta Ram Jakhar) को देखा तो वह धौंस के साथ बोला, “खरता, ऐथ कोंकर फिरे रै ? (खरता, यहां कैसे घूम रहा है ? ) ” तब खरताराम जी ने कहा, “ताजे काकै री तोडकी गमगी, मलजी दीठी कै ? ( वह तो चाचा ताजाराम की ऊंटनी को खोज रहा है। उसके पदचिह्न यहां तक आ गये है।) “डकैत ऊमपुरी को शक था कि खरताराम किसान जागृति के लिये काम कर रहे है और उसका इरादा तो खरताराम जी की हत्या करना था ही। इसलिये उसने खरताराम जी को मारने के लिये अपनी रायफल तानी किंतु घर के मालिक ने कहा कि यह तो अपनी ऊंटनी को खोज रहा है। इसकी इतनी हिम्मत थोड़े ही है कि वह तुम्हारी शिकायत पुलिस तक कर दे या तुम्हारी मुखबिरी कर दे। यदि इसे मारना ही है तो पहले मेरा घर जला दो और बाद में इसे मारो। मेरे को क्यों बर्बाद कर रहे हो? मेरे को यहां पर लोग रहने नहीं देंगे। लोग आरोप लगायेंगे कि तुम्हारी मिलीभगत से खरताराम की हत्या हुई है। इस प्रकार उनके बीच-बचाव करने पर खरताराम जी की जान बच गयी। कहते है कि जाको राखो सांइयों मार सके न कोय।

ढाणी से बाहर आते ही खरताराम जी ने पुलिस पार्टी को अंगोछे से इशारा किया। थोड़ी देर से मोटर गाड़ियों की आवाज आने लगी। डकैतों को पूरा अनुमान हो गया कि पुलिस आ गयी है। उसने कहा कि मेरे में धोखा हो गया है। उन लोगों ने अपने ऊंट पर पिलाण डाला। पुलिस पार्टी उस ढाणी को घेरने के आगे बढ़ी तब तक डकैत ऊमपुरी और उसका भतीज लालपुरी ऊंट लेकर वहां से निकलने में सफल रहे । तब तक पुलिस की गाड़ियां वहां पहुंच गयी। फिर भी डकैत भाग कर पास ही बनी सातलाणी नाडी में चले गये। ऊंट को एक खेजड़ी से बांध दिया। डकैतों ने नाडी (छोटा तालाब) में जाकर एक खेजड़ी की ओट में छुरियों से मोर्चा खोदा और वहां पर खेजड़ी के पीछे मोर्चा संभाला और फायरिंग आरम्भ कर दी। पुलिस ने जवाबी कार्यवाही करते हुए फायरिंग प्रारम्भ की। पुलिस की गोली से डकैतों का एक ऊंट मारा गया। यह ऊंट डकैत शिवगर बाबा से लूट कर ले गये थे ।

इस मुठभेड़ में पुलिस दल ने अपनी गाड़ी से कुछ फासले पर स्थित एक कैर की झाड़ी के पास मोर्चा संभाला। उधर डकैत गाड़ी को निशाना बनाकर फायरिंग करते रहे ।

तब तक रात हो गयी। डकैत सरगना ऊमपुरी का खास विश्वासपात्र और भतीजा लालपुरी तो रात के अंधेरे का फायदा उठाकर पेट के बल पर रेंगता हुआ भागने में सफल रहा किंतु ऊमपुरी खुद पुलिस मुठभेड़ में गोली से मारा गया। यह घटना 22 मार्च 1950 की है। गोलियां आनी बंद हो गयी किन्तु पुलिस वालों की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वे निकट जाकर डकैत के जिंदा होने या मृत होने का पता लगा सके। उधर पुलिस के पास साधन सीमित थे। पुलिस के पास गोलियां खत्म हो गयी। खरताराम जी को पोकरण भेजा कि वहां से आरएसी से सहायता मांगी जाय। खरताराम जी पोकरण गये तथा सारी हकीकत सुनाते हुए आरएसी से तुरन्त मदद करने को कहा। आरएसी ने आकर तत्परता से मोर्चा संभाला। आरएसी के जवानों ने डकैतों पर ग्रेनेड फेंके। और आखिर पुलिस को विश्वास हुआ कि डकैत मारा गया है। उस दिन ऊमपुरी का खास दायां हाथ खानूड़ा राईका साथ नहीं होने के कारण वह बच गया ।

फलोदी ले जाकर डकैत का पोस्टमार्टम करवाया गया और फिर लाश परिजनों को सौंप दी गयी।

सामन्तवादी राज में इस प्रकार के खुंखार डकैत सरगना की मुखबिरी कर मरवाना कोई हंसी मजाक का खेल थोड़े ही था किंतु शेर-दिल चौधरी साहब ने वह काम कर दिखाया जिसके लिये प्रशासन और पुलिस एड़ी-चोटी का जोर लगाये हुए था, फिर भी सफलता उन्हें कोसों दूर भी दिखायी नहीं दे रही थी।

जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है कि सांकड़ा क्षेत्र में डकैतों की आठ-दस गैंगें थी। अब ये सब डकैत चौधरी साहब की जान के दुश्मन बन गये । बलदेवराम मिर्धा जोधपुर राज्य के पुलिस महानिरीक्षक थे। उन्होंने खरताराम को अपने पास बुला लिया। उन्होंने कहा कि अभी वापस भणियाणा मत जाना, नहीं तो डकैत बदला लेने के लिये आपको मार देंगे। मिर्धा साहब ने उन्हें राज्य सरकार से बंदूक का लाइसेंस दिलवाया और एक बंदूक ‘मेड इन इंग्लैंड’ दिलवायी, जो आज भी चौधरी साहब के घर में उनके सामन्तवाद और डकैतों से संघर्ष की कहानी याद दिला रही है। यह बंदूक और 50 कारतूस तीन जुलाई 1952 को एडिशनल सुप्रिडंट ऑफ पोलिस लाईन जयपुर के हस्ताक्षरों से जारी किये गये। इस साहसिक कार्य के लिये खरताराम को सम्मानित किया गया।

उसके बाद राज्य सरकार में कुम्भाराम आर्य और नाथूराम मिर्धा जैसे किसान पुत्र मंत्री बन गये, जिन्होंने सारे डकैतों का खात्मा करवा दिया। बाड़मेर-जैसलमेर के डकैतों का सफाया करने के लिये “आपरेशन टाईगर” चलाया। इस आपरेशन में कई डकैत मारे गये और शेष बचे, उन्होंने पुलिस या न्यायालयों में आत्मसर्मपण कर दिया । तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री जयनारायण व्यास ने इन डकैतों से सहानुभूति रखते हुए स्वयं सांकड़ा गये और कुछ डकैतों को विशेष पैकेज देकर आत्मसमर्पण करवाया।

अप्रेल 1962 में जैसलमेर के बसीयां क्षेत्र में डाकुओं का सफाया करने के नाम पर राज्य सरकार के पुलिस विभाग ने एक “टाइगर ऑपरेशन” चलाया था। बसीयां के कुल नौ डाकुओं को समाप्त करने के उद्देश्य से सात जिलों के पुलिस अधिकारियों को एकत्र करके बसीयां के इलाके में पुलिस ने जिस प्रकार दमन चक्र चलाया, वह स्वतंत्रता के बाद पुराने ढंग का पहला प्रदर्शन था। जब डाकू पुलिस के हाथ नहीं लगे तब उनके संबंधियों, पड़ोसियों से पूछताछ की।

बसीयां जैसलमेर से दक्षिण की तरफ फतहगढ़ तहसील का एक इलाका है जहां पर पीढ़ियों से करने वाले लोग रहते है। सांकड़ा के मनोवैज्ञानिक प्रयोग के प्रति असहमति प्रकट करते हुए राज्य के गृहमंत्री ने जिस प्रकार पुलिस को दमन करने की छूट दी वह वास्तव में आश्चर्यजनक थी। 23 सितम्बर 1962 को जब बसीया की घटनाओं पर कतिपय पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध अदालतों में मुकदमें वाद दायर हुए। इस पर क्षुब्ध होकर व्यास जी ने दिल्ली से राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री सुखाड़िया जी से मिलने जयपुर गये और मामले की जांच करने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने जैसलमेर के जिलाधीश द्वारा जांच करवाने का आश्वासन दिया।

व्यास जी के जीवनकाल में ही राज्य सरकार द्वारा दो-एक व्यक्तियों का मुहावजा स्वीकृत हो गया था। वे अंतिम दम तक बसीयां के मामले में न्याय करने पर जोर देते रहे। सांकड़ा जैसलमेर जिले की पोकरण तहसील का एक महत्वपूर्ण गांव है। सांकड़ा पंचायत समिति इसी गांव के नाम से बनायी गयी है। राजस्थान के इतिहास में सांकड़ा अपनी विशिष्टता रखता है। कुछ वर्ष पहले यह सांकड़ा मारवाड़ राज्य के लिये भारी सिर दर्द था । तब लूट, चोरी व अराजकता आदि के कारण आतंक का केन्द्र माना जाता था। किसी भी बड़े से बड़े शासक अधिकारी की उस क्षेत्र में जाने की हिम्मत नहीं होती थी। वहां रियासती शासन का अस्तित्व नहीं के बराबर था। वहां का न्याय व प्रशासन स्थानीय पंचायतों के माध्यम से चलता था और पंचायतों का संचालन डकैतों के हाथ में था। बड़े से बड़े कत्ल का अपराध और हजारों रुपयों के लेन देन के दावे आपसी समझौते से तय हो जाते थे। राज्य नियंत्रण से सर्वथा मुक्त सांकड़ा स्वतः में एक चुनौती था ।

सांकड़ा पोकरण नगर से 27 मील दूर दक्षिण पश्चिम में स्थित एक ग्राम अवश्य है। मगर केवल नाम का सांकड़ा है। उसका विस्तार करीब सात वर्ग मील में फैला है। वह छोटी छोटी कई ढाणियों जैसे केवतसिंह की ढाणी, उतमसिंह की ढ़ाणी या सांवलसिंह की ढ़ाणी आदि से घिरा है। वे ढ़ाणियां भी आध-पौन मील की दूरी पर इस प्रकार बसाई गई थी कि एक ढ़ाणी में छिपा हुआ चोर या डाकू पुलिस अधिकारियों का पीछा करने पर आसानी से दूसरी ढ़ाणी में छिप सके। सांकड़ा ग्राम का नाम वहां के एक प्रसिद्ध सांकड़या कुए से पड़ा बताते है। कहते है कि उस क्षेत्र में उत्पन्न प्रत्येक बच्चे को बचपन से ही सर्वप्रथम उस कुएं के पानी का एक घूंट पिलाया जाता था। मानो कि उसको अपने पूर्वजों की परम्परा को कायम रखने की दीक्षा दी जाती थी। सांकड़ा व आस-पास के क्षेत्र को ‘ठरड़ा’ भी कहते है । ठरड़ा के चोर व डाकू सारे मारवाड़ में बड़े माने जाते थे। वहां के चोर व डाकू न केवल राजस्थान में ही नहीं अपितु सौराष्ट, गुजरात व मालवा तक में चोरी व डकैती के लिये छापा मारी करते थे। मारवाड़ राज्य ने सबसे पहले वहां एक पुलिस थाना कायम किया और एक पक्का मकान बनाया। राजस्थान संघ बनने तक और उसके बाद भी सांकड़ा विकास खंड कायम होने तक वही एक मात्र पक्का भवन सांकड़ा में था । सांकड़ा के चोरों को सारे राजस्थानी व्यंग्य में संत कहा करते थे। इन ‘संतों’ के विषय में एक प्रसिद्ध कहावत है कि

संत बसे सब सांकड़े, शेखासर आरंग

बिरला तो बारू बसे, बसियां संत अनन्त ।।

इस प्रकार सांकड़ा, शेखासर, आरंग, चोचरा, बारू और जैसलमेर का बसियां का इलाका ये सारे क्षेत्र उन डाकू संतों के लिये प्रसिद्ध था । “

बात 30 जनवरी 1953 की है। लोकनायक श्री जयनारायण व्यास राजस्थान के मुख्यमंत्री थे। राज्य का गृह विभाग भी उन्हीं के हाथ में था। इस क्षेत्र की शांति व व्यवस्था की दृष्टि से व्यास जी ने उच्च पुलिस अधिकारियों से परामर्श करके जोधपुर डिवीजन के तत्कालीन कमिश्नर मेजर दौलतसिंह, डी आई जी श्री गणेशसिंह तथा अन्य साथी कार्यकर्ताओं के साथ जिनमें सर्वश्री छगनलाल चौपासनीवाला, पोकरदास जी व लीलाधर जी व्यास प्रमुख थे। सांकड़ा जाने का कार्यक्रम बनाया । . लोक नायक जिस दिन सांकड़ा पहुंचे वह 30 जनवरी पूज्य महात्मा गांधी का बलिदान दिवस था। वहां पहुंचकर सर्वप्रथम उस सांकड़िये कुए को देखा जो डाकू पैदा करने के लिये कुख्यात था।

उन्होंने मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के तौर पर वहीं घोषणा कर दी कि “सांकड़ा

क्षेत्र के फरार व्यक्ति यदि स्वतः आत्मसमर्पण कर देंगे तो सरकार उनको सहानुभूतिपूर्वक अच्छा नागरिक बनने में सहायता करेगी। ” जोधपुर स्टेट के राजा सर प्रतापसिंह जी ने काफी कोशिश की, परन्तु डाकुओ का पैदा होना जारी रहा।”

ऐसा दबदबा था उस समय उस क्षेत्र में डकैतों का। वहां पर पुलिस और प्रशासन के बड़े-बड़े अधिकारी भी जाने से कतराते थे। उन डकैतों का नाम लेने भर से आम जन तो क्या पुलिस और प्रशासन के अधिकारी भी कांपते थे। उस समय चौधरी साहब ने डकैतों का मुकाबला कर आम जन को राहत उपलब्ध करवायी, जो इतिहास में हमेशा याद की जायेगी।

इस मुठभेड़ के बाद काफी समय तक ऊमपुरी के साथी डकैतों ने चौधरी साहब को परेशान किया। भणियाणा के प्रहलादोणी गोदारों ने उनका हमेशा ही साथ दिया। वे हमेशा ही सतर्क रहे। कुछ समय बाद नाथूराम जी मिर्धा के सहयोग से उन्हें आत्मसरक्षार्थं बंदूक का लाईसेंस मिल गया। कुछ समय बाद मोडरड़ी गांव के निवासी नगसिंह पोकरणा की सांढ़ों का टोला विचरण करता हुआ पाकिस्तान की सरहद में चला गया। वहां के लोगों ने उसे यहां के दाग (चिह्न) देखकर टोले की सांठें पकड़ ली। उन्होंने काफी प्रयास किया किन्तु वे सफल नहीं हो पाये। जब खरताराम जी को मालूम चला तो उन्होंने कहा कि हमारे गांव का धन कोई दूसरा ले जाय, यह तो बहुत बुरी बात है। उन्होंने बिना मालिक के कहे ही प्रशासन के सहयोग और अपने प्रयासों से वे सांढें वापस लाकर नगसिंह पोकरणा को सुपुर्द कर दी। उस समय चौधरी साहब की प्रशासन में तूती बोलती थी।

इससे आम जन के मन में आ गई कि चौधरी साहब काम के आदमी है। वे जाति-पांति का भेद किये बिना लोगों की मदद करते है। इससे उस मुठभेड़ वाला किस्सा कुछ शांत हुआ।

ये डकैत भी वहां पर कुछ लोगों के लिये नायक थे। डकैत सरगना स्वामी ऊमपुरी की प्रशस्ति में उनके प्रशसंकों ने एक कथा तैयार करवायी। इस कथा में ऊमपुरी की बहादुरी का वर्णन है तथा चौधरी साहब के बारे में कुछ ओछी टिप्पणियां है। यह गीत हालांकि भणियाणा में तो कोई नहीं सुनता था।

एक बार जयनारायण व्यास फलोदी डाक बंगले में आये हुए थे। खरताराम जी भी वहां उपस्थित थे। एक मांगणियार गायक कलाकार डकैत ऊमपुरी की प्रशस्ति में गीत गा रहा था। जयनारायण व्यास की सहानुभूति हमेशा उन डकैतों के प्रति रही।
उस गीत में खरताराम (Kharta Ram Jakhar) जी के बारे में कुछ ओछी टिप्पणियां की हुई थी। व्यासजी ने उस गायक से पूछा कि तुम खरताराम को जानता है तो प्रत्युत्तर में उसने कहा कि वह उन्हें नहीं जानता है। व्यास जी ने वहां उपस्थित खरताराम जी की तरफ संकेत करते हुए कहा कि वे खरताराम जी यही है। इतना सुनते ही वह गायक वहां से नौ दो ग्यारह हो गया।

ऐसा ही एक वाकया जोधपुर के महात्मा गांधी अस्पताल में हुआ । खरताराम जी वहां पर उपस्थित थे और एक गायक कलाकार ऊमपुरी की प्रशस्ति में वही गीत गा रहा था और लोगों से रुपया आठ आना प्राप्त कर रहा था। वहां पर उपस्थित लोगों में से किसी ने बताया कि तुम जिस खरताराम के बारे में ओछी टिप्पणियां कर रहे हो, वह खरताराम यह है। तब वह कलाकार भाग गया। उसके वाद्य यंत्र वगैरह वही रह गये ।

चौधरी साहब ने हमेशा ही गरीबों की भलाई के काम किया, आहत को राहत दी। चौधरी साहब ने वह हिम्मत दिखायी, जिसकी उस जमाने में कल्पना करना ही मुश्किल था। आपने अपनी जान पर खेल कर क्षेत्र में आम जन के शांति से जीने का रास्ता प्रशस्त किया।