ब्लूटूथ और कर्णपिशाचनी

साल 2014 की बात है हम CABI डायरेक्ट टू फार्म प्रोजेक्ट के आखिरी राउंड में थे जिसमें 3 महीनों में लगभग 4 लाख किसानों का प्रोफाइल तैयार किया जाना था और तब न दिन का पता होता था और न रात का, अक्सर दिल्ली मीटिंग्स में भी जाना पड़ता थाऔर रातों रात सफ़र करके सुबह दिल्ली पहुंच जाया करते थे।

नवम्बर 2014 की वो कोई रात थी और रात को एक दस पर चंडीगढ़ से चलने वाली कालका मेल पकड़नी थी और मैं बस  बड़ी ही बेतरतीबी वाली हालत में दफ्तर से ही भाग कर आया था।

ट्रेन में उस दिन हमारे केबिन में कोई नही था, मेरी सबसे ऊपर वाली बर्थ थी और मैं अपना झोला सर के नीचे लगा कर और एक खेस ओढ़ कर सो गया।

रात को मेरी नींद खुली और नीचे झांका तो नीचे वाली बर्थ पर एक युवा बैठा मोबाइल में कुछ कर रहा था। मैं भी खेस वापिस ओढ़ कर अपने मोबाइल को टटोलने लगा।

तब मेरे दिमाग में जाने क्या ख्याल आया मैंने वैसे ही ब्लू टूथ ऑन किया और स्कैन कर लिया उसमें एक डिवाइस नाम आया “विवेक गुप्ता” जो सौ प्रतिशत उसी लड़के का नाम था जो नीचे बैठा मोबाइल चला रहा था।
थोड़ी देर के बाद मैं जब वॉशरूम जाने के लिए नीचे उतरने लगा तो न जाने मेरे अंदर क्या आया मैं नीचे बैठे लड़के को एक टक देखा और बड़े अधिकार से कहा विवेक गुप्ता पैर साइड में करले  वो एकदम चौंका और एकदम साइड में हो गया।

मैं थोड़ी देर में आया बिजली की गति से आया और सीधे ऊपर चढ़ गया और खेस में घुस गया। मुझे ठीक ठाक पता था नीचे पड़े विवेक गुप्ता के मन मे क्या उबल रहा था।

खेस में बैठे बैठे मैंने फेसबुक खोली और उसमें  विवेक गुप्ता ढूंढा और जल्दी ही मुझे थोड़ा सा प्रयास करके वो प्रोफाइल मिल गया जो नीचे बैठे हुए लड़के का था और मैं उसे पढ़ने लग गया, उसे पढ़ते पढ़ते  मुझे एक झटका नींद का लग गया।

जब नींद खुली तो ट्रेन पानीपत स्टेशन पर खड़ी थी और कैबिन भी सवारियों से भरने लगा था और नीचे वो विवेक गुप्ता नही था। मुझे लगा कि वो उतर गया तभी मैने देखा कि विवेक गुप्ता जी दो चाय लेकर प्रकट हुए और एक चाय मेरी ओर कर दी।

मैंने उसे कहा भाई विवेक ऊपर ही आ जा, और मैंने उसकी भी चाय पकड़ ली और फिर हम दोनों भाई बैठ कर चाय पीने लगे और उसने मेरे से पूछा कि मैं आपको नही पहचानता हम पहले कहाँ मिले हुए हैं।

मेरे दिमाग में तब तक एक छोटी सी शरारत का प्लाट सेट हो चुका था, उसको मैंने नारायण दत्त श्रीमाली वाली किताब में बताए गए कर्ण पिशाचनी वाले फीचर की पूरी कहानी सुना दी।

वो एक दम सेट हो गया और उसके फेसबुक प्रोफाइल में से जो जो मैने पढा था वो टपका टपका करके उसको सुना दिया।

पानीपत से दिल्ली आते आते वो मेरे पीछे लग लिया और अपना काम छोड़ कर साथ मे चलने को अलोमोस्ट तैयार हो लिया।

यह सब अनायास ही हो गया था, धीरे धीरे शरारत बहुत बड़ी हो गयी थी, अब मैं उसमे से निकलूँ कैसे ये मेरी समझ मे नही आ रहा था।

जब ट्रेन सब्जी मंडी स्टेशन पर खड़ी हुई तो वो कर्ण पिशाचनी को सिद्ध करने की फीस पूछने लगा,अब मुझे लगा कि भाई ये तारना पड़ेगा तब मैंने कहा भाई बस फ़ोन में ब्लूटूथ होना चाहिए कर्ण पिशाचनी को सिद्ध करने के लिए।

वो बोला कैसे?

उसको मैंने ब्लूटूथ स्कैन करके दिखाया तो उसमें खूब सारे नाम और आ गए क्योंकि कम्पार्टमेंट भरा हुआ था उसमें विवेक गुप्ता अभी भी लिखा हुआ आ रहा था।

वो एकदम पकड़ गया फिर वो बोला और बाक़ी इनफार्मेशन उसके लिए मैंने कहा भाई फेसबुक में इन नामों को खोज लो यदि किस्मत अच्छी हुई तो कुछ मिल भी सकता है।

विवेक गुप्ता की एक नई शक्ल निकल कर सामने आ गयी वो बहुत खिलखिलाया और विस्मित भी था बोला भाई साहब जब आप नीचे उतरे थे तो ट्रेन शाहाबाद क्रॉस कर रही थी और जब तक आपसे बात नही हुई थी पानीपत में तब तक दिमाग का दही बन चुका था।

पानीपत से दिल्ली के बीच मे जब आप मेरे को मेरे प्रोफाइल से ही मुझे बातें बता रहे थे वो मेरे जीवन का बेस्ट टाइम के जैसे लग रहा था ऐसे लग रहा था के अब जीवन मे सिद्ध पुरुष मिल गया है और अब जीवन के बहुत सारे सवाल हल हो जाएंगे।

लेकिन अब और भी अच्छा लग रहा है क्योंकि मुझे जीवन की सार्थकता और आनंद का एक अलग सा एहसास हुआ है।

मैं भी बस मीटिंग में जाने के लिए तैयार हो गया और कभी कभी विवेक गुप्ता को याद कर बैठता हूँ। सही में कर्ण पिशाचनी कैसी होती होगी उसकी हल्की सी फीलिंग का अनुभव तो मैंने ले ही लिया है।

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