आखिर मोदीजी नये कृषि कानूनों को वापिस क्यों नही ले रहे ?

देश में किसान आन्दोलन को लगभग एक वर्ष होने को आया है जिसमें किसानों के प्रतिनिधि कई दौर की बैठकें सरकार के साथ कर चुके हैं और जिनका कोई नतीजा नही निकला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन कानूनों को वापिस लेने को तैयार नही हैं और उनका अड़ियल रुख देशवासियों के सामने एक सवाल बना हुआ है। इस लेख में मैं कुछ हाल फिलहाल में प्राप्त आंकड़ों के एनालिसिस के द्वारा यह समझने का प्रयास करूंगा कि ऐसी कौन सी संभावित वजहें हो सकती हैं जिनकी वजह से प्रधानमंत्री मोदी इन कृषि कानूनों को कैंसिल नही कर रहे हैं।

नेशनल स्टेटिस्टिक्स ऑफिस जिसने जुलाई 2018 से जून 2019 तक ग्रामीण भारत में रहने वाले कृषि आधारित किसान परिवारों और पशुपालन आधारित पशुपालक परिवारों के हालातों का सर्वे किया था और प्रकाशित रिपोर्ट में यह बताया गया है कि विभिन्न कृषि उत्पादों का उत्पदान करने वाले कृषक समूहों में उन्हें मिलने वाले मूल्यों के प्रति असंतोष है जिसका विवरण इस प्रकार है :

अनाज पैदा करने वाले किसान 25 % में असंतोष है

फल पैदा करने वाले किसान 28% में असंतोष है

तिलहन पैदा करने वाले किसान 35% में असंतोष है

सब्जियां पैदा करने वाले किसान 44% में असंतोष है

कंद पैदा करने वाले किसान 47% में असंतोष है

फूल पैदा करने वाले किसान 84% में असंतोष है

इस सर्वे में यह बात सामने आई कि किसानों में असंतोष का मुख्य कारण उचित भावों का न मिलपाना है वो वे मुख्यत: नीचे बताये गये आठ प्रकार के खरीदारों  के उपर ही निर्भर करते हैं

कृषि उत्पाद मार्केटिंग कमेटी जिसे APMC भी कहते हैं

फड

प्राइवेट लोकल मंडी

गवर्नमेंट एजेंसियां

कोआपरेटिव संस्थाएं

किसान उत्पादक कम्पनियां

कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कराने वाले प्राइवेट प्रोसेसर

इनपुट डीलर्स आदि

भारत में मौजूद किसानों की संख्या का कुल 5.4% किसान ही APMC मंडियों में अपना कृषि उत्पाद बेचते हैं जबकि प्राइवेट लोकल मंडियों में कुल 77.5% अपने कृषि उत्पाद बेचते हैं। इनपुट डीलर्स के द्वारा बनाये गये फडों पर 17% किसान अपने कृषि उत्पाद बेचते हैं। APMC मंडी में भाव कम मिलने का मुख्य कारण है कि पुराने कानूनों के तहत किसान एक ही मंडी से बंधा हुआ है और वो अपना कृषि उत्पाद कहीं और  ले कर ही नही जा सकता है इसीलिए कोई भी ऐसी व्यवस्था कभी बनी ही नही जिससे अन्य मंडियों में उपलब्ध मांग का किसान को लाभ मिल सके।

मौजूदा दौर में किसानों को कृषि उत्पादों की कम कीमतें मिलने ने उनका गला घोंटने का काम किया है। किसानों को मंडी में दो शार्कों का सामना करना पड़ता है ( मैं यहाँ शार्क इसी लिए लिख रहा हूँ क्यूंकि इन नये कृषि कानूनों के लागू होने से पहले सभी उन्हें शार्क ही पुकारा करते थे)।

नम्बर एक आढतिया जो फसल की बोली करवाता है और कमीशन प्राप्त

नम्बर दो मंडी में लाइसेंस प्राप्त खरीदार जो फसल को खरीदने का एकाधिकार रखता है

जब ये दोनों जीव अंदर खाते मिल जाते हैं तो एक डेडली कम्बीनेशन बन जाता है जो घट तौली, कम कीमत, रिजेक्शन देरी से भुगतान आदि के लिए जगत प्रसिद्ध है मार्किट फीस, आढती का कमीशन और ग्रामीण विकास का सेस यह सब मिलाकर कोई साढे आठ प्रतिशत बैठ जाता है और यह किसान की जेब से ही कमाया जाता है। इसके अलावा कभी भी सही प्राइस रिकार्ड नही किया जाता है और जो कमीशन चोरी होती है वो भी एक बड़ा विषय है जिसपर देश में कभी बात नही होती है मुझे याद है एक बार ट्रिब्यून अखबार के अंग्रेजी संस्करण के पत्रकार ने चौधरी भजन लाल को सलाह देते हुए कहा था कि हरियाणा की राजगद्दी का रास्ता मंडियों से होकर ही जाता है। मुझे यह बात पत्रकार महोदय ने अपनी रिटायरमेंट के बाद स्वयं बताई थी।  

अब प्राइवेट मंडी की बात करें कि यहाँ भी किसान को अच्छा रेट क्यों नही मिल पा रहा है?

व्यवाहरिक रूप से देश में पुराने कानूनों के अनुसार जो आज लागू हैं कोई भी किसान मंडी के बाहर नही बेच सकता है और ना ही कोई व्यक्ति जो मंडी में बतौर क्रेता पंजीकृत नही है खरीद भी नही सकता है।

ब्यूरोक्रेट नेता और व्यापारी तीनों का आपस में जोरदार गठजोड़ है और चारों और से रास्ते बंद करके यह मंडी में अपने अनुरूप सारे काम करवाते हैं जो मन करता है वही रेट लागू करवाते हैं जिन इलाकों में किसान दूर दूर तक फैले हुए हैं वहां भी कानूनों का हवाला देकर किसी भी असली जरूरतमंद खरीदार व्यापारी को आने नही देते हैं और अपने नेटवर्क के जरिये बस औने पौने दामों पर खरीद करवाते रहते हैं।   

यह बात बिलकुल साफ़ है कि लगभग 83% किसानों को मंडियों और लोकल मार्किट में एकदम नीचे का भाव ऑफर किया जता है। क्यूंकि भावों को बढने से रोकने वाले सभी कारकों को पुराने कानूनों ने पूरी तरह से जकड़ा हुआ है। यह केवल तभी संभव हो सकता है। जब मंडी कानूनों को व्यवाहरिक बनाया जाये और उसमें एकाधिकारों को सीमित या  समाप्त किया जाये और कोई भी खरीद सके को कानूनी जामा पहनाया जाये।

मोदी सरकार ने यह पंगा ले लिया और तीन कानून बना डाले जिन्हें

  • The Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act, 2020
  • The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Act, 2020
  • The Essential Commodities (Amendment) Act, 2020 के नाम से जाना जाता है

यह कानून सभी non-APMC प्लेटफॉर्म्स पर खरीदी को कानूनी रूप से वैध घोषित करता हैं, हालाँकि इसमें सभी राज्य सरकारों को अधिकार दिए गये हैं कि वे अपने हिसाब और हालातों के मद्देनजर इन्हें लागू करवाएंगे। लेकिन यह मंडी में पहले होने वाली गलत प्रक्रियाओं को किसान हित में रोकने में सक्षम है।

किसान अपनी फसल को जहाँ चाहे जिसे चाहे बेच सकता है। यह बात तो अक्सर लोग कहते हैं कि पहले भी तो ऐसा था लेकिन वो यह नही बताते कि कोई किसान से फसल खरीद नही सकता था। कानून लागू करने वाले इसे बड़ी सख्ती से लागू किया करते थे।

इन कानूनों में किसानों को आजाद करने का दम होने के साथ साथ एग्रीबिजनेस में नये इंटरप्रेन्योर्स के आने की सम्भावना बढ़ जाएगी किसान भी छोटी मोटी प्रोसेसिंग यूनिट्स लगा कर गाँवों में वैल्यू एडिशन की सोच विकसित कर सकेंगे। जो आज की डेट में संभव नही है। क्यूंकि एक नम्बर में सामान खरीद नही सकते फिर प्रोसेसिंग करके बिल काटना तो बहुत दूर की कौड़ी है। यही वजह है कि गाँवों में नये रोजगारों का सृजन उतना नही हो पा रहा है जितना पोटेंशियल है।

यदि इन हालातों में भी किसानों को यह नये कानून नही चाहिए  तो कोई भी व्यक्ति जो लॉजिकल तरीके से सोचता है वो आने वाले हालातों को देख कर घबरा जाएगा। हालाँकि जनवरी 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने इन कानूनों को लागू किये जाने  पर रोक लगा दी है और इन कानूनों के प्रभाव को अध्यन करने के लिए एक कमेटी का भी गठन किया है जिसने मार्च 2021 में अपनी रिपोर्ट भी जमा कर दी है।

किसानों की मांग

किसान बस दो ही मांग कर रहे हैं एक तो ये तीनों कानून वापिस ले लो , दूसरा एम.एस.पी. गारंटी कानून बना दो

मोदी सरकार कानून वापिस क्यों नही कर रही

हालाँकि सच्ची बात तो सरकार और उसकी कैबिनेट को ही पता है हम तो बतौर नागरिक और शोधार्थी कयास लगा सकते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मोदी कैबिनेट को यह पता है कि देश के किसानों के पास क्रेताओं के ऑप्शन बढाने से किसानों को फायदा होगा। उनके सोचने समझने और काम करने की गुणवत्ता और तरीके में सुधार आयेगा। जिससे किसान खुश्हाल होगा। प्राइवेट प्लेयर्स के आ जाने से तकनीक और तौर तरीकों में भी बहुत अधिक सुधार आने की गुंजाईश है । नये कानूनों के तहत लागू किये गये प्रावधानों जैसे कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग आदि को देश के कई राज्य सफलतापूर्वक लागू कर चुके हैं । हरियाणा में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग रूल्स साल 2007 से बने हुए हैं और काफी बड़े इलाके में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग सफलतापूर्वक की जाती रही है ।

इसी तरह से पंजाब में नेस्ले और पेप्सिको लम्बे समय से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कर रही हैं। ग्रामीण सेक्टर को सिर्फ उत्पादन पर फोकस करके जीववित नही रखा जा सकता है इसीलिए उसके लिए नये प्रयोग किये जाने अत्यंत आवश्यक है । इसके अलावा मोदी सरकार को ऐसा लगता है कि फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया जैसी संस्थाएं एक सीमा तक ही पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के लिए खरीदारी कर सकती हैं और इन संस्थाओं में भी तकनीक को ग्रहण करने और लागू करने की दर बेहद धीमी है जिसकी वजह से बहुत बड़ी संख्या में अनाजों का खराबा और हेराफेरी बड़े स्तर पर हो जाती है क्यूंकि वैल्यू चैन बहुत ज्यादा लम्बी है और कानून बेहद लचीले।

देश के किसानों के हित को लार्जर इंटरेस्ट में देख कर मोदी सरकार इन्हें किसी भी कीमत पर लागू करना चाहती है ताकि किसी भी तरह से ग्रामीण सेक्टर में किसानों की तरक्की का रास्ता खुले और शहरों की तरह गाँवों में भी किसान और कारीगर सोखे होकर अपना जीवन व्यतीत कर सकें।

मेरे निजी विचार

मुझे भी किसानों के साथ काम करते करते लगभग 21 वर्षों का कार्यानुभव हो चला है और मैंने लगभग 6 वर्ष तो सीधे कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग विषय पर हरियाणा में काम करने का अनुभव मिला है । मैंने हफैड पंचकूला के माध्यम से देसी गेहूं, बासमती धान और जौ की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का अनुभव लिया है । यह कार्य मैंने हरियाणा के 17 जिलों में और सभी तरह के किसानों के साथ करके देखा है ।

यदि कानून मजबूत हो और सरकार का सपोर्ट किसानों को हो तो किसानों को बहुत अधिक फायदा मिलता है और उत्पाद की क्वालिटी शानदार मिलती है । इसीलिए मुझे तो कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग विषय से डर नही लगता है और यह बात जो प्रचारित की जाती है कि किसानों की जमीन चली जाएगी इस बात की गारंटी तो राज्यसरकार दे सकती है कि कॉन्ट्रैक्ट इस तरीके से बनाये जाएँ कि किसान निर्भय होकर अपना काम करे।

आज भी हरियाणा और पंजाब राज्यों को यदि देखा जाये तो डेढ़लाख एकड़ भूमि पर चुप चपीते कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग चल रही है और किसान भी खुश है ।

सिर्फ पुराने मंडी कानूनों के चलते किसानों का कभी भी भला नही हो सकता है । नये कानून तो चाहिए ही हैं लेकिन उनके प्रावधान क्या हों इसपर देश में व्यापक डिबेट होनी चाहिए और मंडियों में से चुनिन्दा क्रेताओं का एकाधिकार समाप्त होना चाहिए ताकि नये एंटरप्रेन्योर्स को प्रोसेसिंग और अपने डिस्ट्रीब्यूशन चैनल विकसित करने के अवसर मिल सकें।

एशेंशियल कमोडिटी एक्ट को डाईल्युट करके जो नया एक्ट बनाया गया है उससे मैं बिलकुल भी कन्विंस नही हूँ क्यूंकि कॉर्पोरेट एजेंसी को अपने हाथ काट कर देने में कोई फायदा देश का मुझे तो नज़र नही आता है । मैं पिछले एक साल से लगातार अपने कान खोल कर बैठा हूँ कि कभी तो कोई सयाना आदमी कहीं से निकल कर बाहर आये और इसे लाने का लॉजिक हमें समझा दे। इस एक्ट के बारे में हर किसी के मन में एक ही खुड्का है कि एक बार कॉर्पोरेट का फ़ूड पर कब्जा हो गया तो यह एटम बम से भी खतरनाक हथियार बन जाएगा।

एम.एस.पी. गारंटी कानून की मांग के बारे में भी मैं एक दम क्लीयर हूँ, यह पूरे देश के किसान को बिना नागा मिलना चाहिए। एक तो पहले एम.एस.पी. भी बड़ा सिकोड़ सिकोड़ कर किसानों को दिया जाता है फिर उपर से वो भी सभी किसानों को नही मिलता है। कभी खरीदार एजेंसीयां एकड़ की लिमिट लगा देती हैं और कभी रजिस्ट्रेशन और गेटपास के झमेले। हालाँकि एम.एस.पी. गारंटी नियम लागू करने से खरीदार एजेंसीयों और प्रोसेसिंग इंडस्ट्री पर बोझ तो पड़ेगा लेकिन इससे आर्थिक असमानता भी दूर होगी और मेहनतकश को उसका हक मिलेगा और देश में बराबर की खुशहाली आएगी

किसानों के साथ रह कर मैंने यह भी महसूस किया है कि अभी किसानों में भी बहुत कमी आ गयी है। उनके खेतों में अब कोई साठ पैंसठ दिन से ज्यादा का काम नही बचा है और वे 300 दिन एकदम खाली हैं। जिसकी वजह से उनके खर्चे लगातर बढ़ते जा रहे हैं और आमदनी सिकुडती जा रही है । सरकारों में पूरी फसल खरीदने का दम नही है । उन्हें कुछ बड़ा सोचना ही होगा । पूरी सप्लाई चेन को कैसे अपने हाथों में लिया जाए और जो कारोबार हाथों से निकल चूका है उसे कैसे वापिस लाया जाये । जैसे दूध का कारोबार जो डेली इनकम का बेहतरीन सोर्स था अब हाथों से लगभग फिसल चुका है ।

देश के सभी हिस्सों के किसानों के साथ नेटवर्किंग विकसित करके प्रोसेसिंग स्टोरेज और डिस्ट्रीब्यूशन पर काम शुरू किया जाये ।

निचोड़

बातों का निचोड़ निकालें तो सिर्फ यही तीन कानून काले नही हैं सभी क़ानून ही काले होते हैं। खासकर किसानों पर कोई तीस चालीस कानून प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लागू होते हैं और उनमें से कोई भी कानून सफ़ेद नही है जिसकी वजह से आज किसानों की हालात पूरे देश में खराब है । किसानों को जागृत होकर सिर्फ विरोध प्रदर्शन में ही अपना समय खराब नही करना चाहिए अपितु एक मजबूत आर्थिक संगठन बना कर व्यवस्था के सर पर खड़े होकर जिम्मेवारी से देशहित में काम करना चाहिए।