समाज सेवा और सम्मान

नारायणगढ़ सिविल हॉस्पिटल में सुबह आठ बजे मेरे एक मित्र श्रीमान अजय वालिया जी दिखाने के लिए ओपीडी की लाइन में लगने लगे तो उसने देखा कि लाइन अभी लंबी है इधर पेट मे चूहे कूद रहे थे तो अपने से आगे वाले को बोल कर नज़दीक की दुकान से एक सैंडविच और पीने के लिए लस्सी का पाउच ले आये और लाइन की साइड में बैठ कर खाने लगे

तभी उनका ध्यान एक आठ साल के बच्चे ने आकर्षित किया जो बेहद भूखी ललचाई नज़रों से उसे देख रहा था। उनसे रहा नही गया और उन्होंने इशारों ही इशारों में उससे पूछा कि बेटा खाओगे क्या? बच्चे की आंख से दो आंसू लुढ़के और उसने सहमति में गर्दन क्या हिलाई इधर बन्दे के दिल मे भावनाओं का बांध टूट गया और वो भाग कर दुकान पर गया और सैंडविच और लस्सी ले आया और बालक को खाने को दे दी।

बालक खुश होकर खाने लगा इधर बन्दे को तृप्ति हो गयी कि सुबह सुबह एक अच्छा काम परमात्मा ने करा दिया जो एक भूखे बच्चे को खाना खिलवा दिया।अभी बन्दा मन ही मन प्रफुल्लित होकर भगवान से शाबाशी के इंतज़ार में था ही और उधर से जोर जोर से गालियों की आवाज सुनी जो एक महिला दे रही थी। गालियों की नेचर और ग्रेविटी से वो समझ गया कि तुझे ही सम्मानित किया जा रहा है।

अब जैसे ही उसने उस महिला से नज़रे मिलाई तो देखा बच्चे ने उसकी ओर हाथ किया हुआ है और महिला की आंखों से अंगारे और चिंगारियां निकल रही है और उसकी गालियां सुन कर उसकी टांगे कांपने लगी और वो माजरा समझ नही पाया।

वो महिला उस बालक की मां थी। जो 2 घन्टे का सफर करके बालक के टेस्ट कराने लायी थी और टेस्ट भूखे पेट होने थे। महिला बालक को लाइन के नज़दीक खड़ा करके कार्ड बनवाने गयी थी। बन्दा जो अभी एक सेकंड पहले परमात्मा से शाबाशी के इंतजार ने था अभी जान बख्शवाने की गुहार लगा रहा था।

जीवन में मैंने अक्सर देखा है कि समाज सेवी लोग अक्सर ऐसे ही सम्मानित होते रहते हैं क्योंकि वो ऐसे ही सैंडविच आए लस्सी लाकर किसी की भी मदद कर डालते हैं और फिर सम्मानित कर दिए जाते हैं।