मरना परना अते किसान कारीगर ते समाज

भूमिका

बात साल 2004 की है तब दिल्ली में मैं सरदार मोहिंदर सिंह ग्रेवाल जो भारत सरकार के कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कास्ट्स एंड प्राईसेज में बतौर फार्मर मेम्बर सेवाएँ दे रहे थे के साथ बतौर गेस्ट उनके सरकारी रेसिडेंस पर रहा करता था। मैं उनके लिखने पढने के काम में उन्हें थोड़ा बहुत सहयोग भी कर दिया करता था और इसी बहाने मुझे खेती किसानी के मसलों पर उनके जीवन के निचोड़ भी सीधे सीखने को मिल जाया करते थे।

मैंने यह बात उन्ही से सुनी थी कि किसान समाज की मर का मुख्य कारण मरना और परना हैं। मतलब किसान परिवार में मृत्यु और विवाह ऐसे दो अवसर हैं जहाँ वो बेशुमार खर्च करने को मजबूर होता है और पूरी उम्र इन्ही दो अवसरों के लिए वो बड़े आर्थिक बोझ के नीचे दबा रहता है।

यह बात मैंने हमेशा गाँठ बाँध कर रखी और जब जब मुझे साल 2005 के बाद मुझे कहीं भी किसानों के साथ उनके हालातों पर चर्चा करने का मौक़ा मिला तो मैंने यह बात जरूर उनके सामने रखी और हरबार उन्होंने इस बात को माना कि हाँ यह हमारे पतन के मुख्य कारण हैं। लेकिन हम समाज की परिपाटी को बदल नही सकते हैं हमने लोगों का खा रखा है और अब हमें लोगों को खिलाना ही पड़ता है।

मेरे मन में हमेशा से यह तकलीफ रहती थी कि जानबूझ कर किसान और कारीगर समाज (मैंने अब मेहनकश लोगों को मजदूर कहना बंद कर दिया है) ऐसे आर्थिक जंजाल में फंस जाता है जहाँ से छुटकारा हर किसी का हो नही पता है और परिवार बड़े दबाव में रहते हैं।

मेरे निजी अनुभव

साल 2010 में जब मेरे विवाह की बात पक्की हुई तो मुझे पहले से ही पता था कि किस पैटर्न पर विवाह करना है मैंने अपने ससुराल पक्ष से तीन निवेदन किये :

नबर एक मैं दिन में शादी करूंगा , नम्बर दो डी.जे. आदि नही बजने दूंगा , तीसरे बिना ढमढमें के सारा कार्यक्रम आयोजित होगा

अब हमारे समाज में तो दिन में शादी कभी होती ही नही है सारा आयोजन ही रात में होता है फिर तडक भड़क और ढमढमें का तो कोई ओर छोर ही नही होता है। पहले तो हाँ हो गयी लेकिन जब रिश्तेदारों ने इफ एंड बट किये तो बात फिर मेरे पर आ गयी और मेरे से सवाल पूछे गये कि ऐसी अजीब से डीमांड क्यों हैं आपकी।

मुझे याद है कि तब मैंने जो जवाब दिए थे वो इस प्रकार हैं :

दिन की शादी क्यों ?रात की शादी का चलन मुगलों और तुर्कों के जुल्मों की वजह से शुरू हुआ था और दशमेश पिता श्रीगुरु गोबिंद सिंह महाराज जी ने जब खालसा सजाया तो दिन में सबके सामने विवाह करने शुरू किये तो हमें अब किसी मुगल और तुर्क का डर नही है। हम रात में चोरी से विवाह करने की परम्परा को क्यों आगे बढायें? उपर से हमारे सनातन धर्म में सूर्यास्त के बाद चिता को अग्नि देंने का भी विधान नही है फिर ये पंडित लोग रात में देवताओं का आह्वान करके विधान से विपरीत कार्य क्यों करते हैं मेरी समझ से बाहर है।
डी.जे. परहेज क्यों ?विवाह जैसे मंगल कार्य में सात्विकता का माहौल अत्यंत आवश्यक है डी.जे. बजाने वाले लोग मजबूरी में कान फोडू शोर बजाते हैं जिसमें हम उसका हाथ नही पकड़ सकते ना जाने क्या बजा दे और ऐसे शोर में ना तो कोई रोटी खा सकता दूसरे उलटे सीधे गानों पर घर के बालकों में मटकते हुए देखना मेरे लिए असहनीय है मैं अपने विवाह में ऐसा बावला काम नही करना चाहता ।
ढमढमें से दिक्कत हमारी सनातन विवाह पद्दति में अनेक बजारू आयटमें और प्रोग्राम घुस गये हैं जिनसे मैं स्वाभाविक रूप से असहज ही रहता था इसीलिए हमने तो समय पूछ लिया था कि हमने कितने बजे पहुंचना है हम अपने आप पहुँच जायेंगे किसी किस्म के दिखावटी कार्यक्रम ना आप उलझो और ना हमे उलझाओ।

बात को कन्क्लूड करने के लिए मैंने यह निवेदन किया था कि मैं किसानों और कारीगरों के साथ काम करता हूँ और उनकी बर्बादी का मूल कारण है उनके समाज में शादीयों पर होने वाला अनावश्यक खर्च यदि मैं उन्ही के तरीके से शादी करूंगा तो मैं किसी को क्या कह पाउँगा भला दूसरे मैं बिलकुल नही चाहता कि हम कहीं भी पैसा बर्बाद करें । मैं खुशकिस्मत था कि मुझे कम कहना पड़ा और सभी मान गये ।

मैं उन दिनों पंचकुला मैं कार्यरत था और 18 अप्रैल 2011 को विवाह का दिन तय था मैं 16 अप्रैल को एकता एक्सप्रेस से घर पहुंचा और 17 अप्रैल का रविवार था और सारी दूकान दकान बंद थी, सुमित कौशिक और सोनिया कौशिक जी के साथ मैं गया और बस एक दूकान जो उनके सम्पर्क वाले की थी बस वहां से एक सिम्पल से ड्रेस खरीद कर आया।

वहां ड्रेस वाले ने महंगे वस्त्र दिखाए जो किराए पर दुनिया ले जाया करती थी। उसने मुझे भी ऑफर किया तब मैंने भाई से निवेदन किया के किराये के लत्ते पहर कै अपने ब्याह मैं जाउंगा तो बावले अपनी नजरों में ही गिर जाऊंगा। मेरा जो ब्योंत है वो बस उसी में ही काम चल जाएगा मेरा।

18 अप्रैल की सुबह 8 बजे मेरी मां ने मुझे कहा कि ये एक बोरी गेहूं चक्की पर देकर आने हैं मैं साईकिल पे धर के गेहूं पिसने देने चला गया और साढे दस बजे मैं दूल्हा बनकर कार में बैठ कर जा रहा था तो चक्की वाले ने देखा और सारे दिन लोगों को यही कहता रहा कि यह लडका अभी तो गेहूं देकर गया था पिसने के लिए और अभी डेढ़ घंटे में शादी करने चल पड़ा।

मेरे ब्याह का कोई कार्ड नही छपवाया गया था। मैंने अपने किसी दोस्त को फोन नही किया क्यूंकि हम तीनों भाइयों के आलमोस्ट सारे दोस्त कॉमन ही थे। मेरी मां ने मुझे बाद में एक किस्सा बताया था कि जब मेरे मित्र सुनीत धवन को फोन किया और उसे बताया कि कल कमल की शादी है आपने आना है तब उसका जवाब यह था कि यदि कमल आ जाएगा तो मैं तो आ ही जाउंगा।

हमारा विवाह बड़े आराम से निबट गया कोई शोर शराबा नही था। सबने दो दो बार खाना खाया पूरे समय पर सारी रस्में रीति रिवाज हुए जिस जिस दोस्त को फोन गया वो आ गया दो चार ऐसे भी यार दोस्त पहुंचे जिन्हें फोन नही मिल पाए थे जब कार्ड किसी के पास नही था तो सबके लिए ओपन इनविटेशन था। जो कोई नही पहुँच पाया हमारे परिवार ने किसी को कोई उल्हाना नही दिया।

अगले कुछ सालों में मैंने अपने दोनों छोटे भाईयों दीपक और दिनेश के विवाह किये वो भी बिलकुल इसी पैटर्न पर , दिन में और बिना किसी तामझाम के किसी के ब्याह में कोई कार्ड नही छपवाया गया बस सभी को फोन कर दिया। हमने किसी की सलाह नही ली , जो हमें ठीक लगा जिस बात की आवाज हमारे मन से आई जैसे भी हमारे हालात थे हमने न अपने पैसे खराब किये और ना अपने समधियों के पैसे खराब करवाए।

पंजाब के मुख्यमंत्री ने पेश की मिसाल

आज यह सब यादें फिर से ताजा हो गयी क्यूंकि पंजाब के मुख्यमंत्री श्रीमान चरण जीत सिंह चन्नी जी ने आज अपने बेटे की शादी की और कार्यक्रम को इतना सिम्पल रखा कि दोनों परिवार गुरद्वारा साहिब में आ गये और जो भी रीति रिवाज होते हैं उनको पूरा करके सभी मेहमानों ने गुरुद्वारे में ही पंगत में बैठ कर लंगर छका और उसके बाद वहीं से सब विदा हो गए

यह कोई छोटी घटना नही है , बहुत बड़ी बात है , एक मिसाल है कि एक मुख्यमंत्री परिवार ने जिसके पास धनबल और समाजिक सम्पर्कों की कोई कमी नही है। वो समाज में ऐसी मिसाल पेश करे जहाँ गुरुद्वारे के लंगर के दाल फुल्के का आनंद लें और कडाह प्रशाद से सभी का मुहं मीठा हो और सब वर वधू को शुभकामनयें देकर विदा हो जाएँ।

यदि सभी लोग ऐसे विवाह करने लग जाएँ तो बेटियां किसे भार लगेंगी और सभी बेटियों की शिक्षा दीक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर ध्यान देंगे और विवाह के लिए परिवारों को कर्जे नही लेने पड़ेंगे और सम्पतियाँ बेचने की नौबतें नही आयेंगी।

किसान और कारीगर समाज को समझने की और विचार करने की आवश्यकता है और ऐसी परिपाटी को लागू करने आवश्यकता है ताकि समाज का संतुलन खराब ना हो और मेहनतकश लोगों पर आर्थिक बोझ ना पड़े।

किन्नौरी समाज का समाजिक मॉडल

साल 2016 में मैं किन्नौर गया था तो मुझे वहां मेरे मित्र श्रीमान शेरिंग नेगी जी के मार्फ़त किन्नौरी विवाह में जाने का अवसर मिला तो मुझे पता लगा कि किन्नौर वालों ने आपने अपने गाँवों में समाजिक रूप से मते पास किये हुए हैं कि कोई कितना भी अमीर हो वो वही शराब आदि पिलाएगा जो वहां की पंचायत ने समाजिक रूप से अप्प्रूव कर रखी है। कोई भी व्यक्ति अपने फंक्शन में धन बल का प्रदर्शन नही कर सकता है। मुझे किन्नौर वालों की यह बात बहुत पसंद आई और हर जगह मैं उनका उदहारण देता आया हूँ।

हम क्या कर सकते हैं ?

समाज में कलांतर में चल रहे रीति रिवाजों में हल्के फुल्के बदलाव सामायिक वजहों से होते रहते हैं और फिर कुछ टीवी फिल्मों आदि से फैशन घुस जाते हैं हमें अपने दिमाग का प्रयोग करके ऐसे सभी कुप्रथाओं और ड्रामों को अपने उपर लागू करके बंद करने की परिपाटी निरंतर जारी रखनी चाहिए।

समाज क्या कहेगा इस बात की चिंता नही करनी चाहिए क्यूंकि ये वही समाज है जिसने भगवान् श्री राम जैसे का का घर भी नही बसण दिया फेर म्हारा सौदा ऐ के है ? समाज में ऐसे ऐसे गुरमुख प्यारे मौजूद हैं जो जवान मौत पर आयोजित खाने में कमी काढ के खड़े हो जाते हैं।

समाज में मौजूद हरेक व्यक्ति अपने परिवार की ओर देखे और अपने पास सामर्थ्य होने के बावजूद भी सिम्पल कार्यक्रम आयोजित करने का प्रयास करे क्यूंकि हमारे द्वारा की गयी धन की बर्बादी से गलत तरीके का दबाव समाज में बनता है जिससे किसान और कारीगर की मर हो जाती है।

भाई चरणजीत सिंह चन्नी को साधुवाद और मुझे संतोष है कि मैं अपने परिवार में इस तरह के प्रयोग कर पाया इसके लिए परमात्मा का धन्यवाद कि हमारे से उसने सही परिवारों को मिलवाया जिन्होंने हमारे निवेदन को समझा और हमें ऐसा कार्य करने को प्रेरित किया जो हमेशा एक उत्साह का एहसास कराता है।