जल की बात

वैसे तो आज हम तकनीकों के संक्रमण काल की दहलीज पर खड़े हैं एक तरफ वो तरीके हैं जिनकी बदौलत हमारे पुरखे बड़ी सहजता से तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए खुद को जिन्दा रखे रहे। दूसरी तरफ वो तरीके हैं जो आज स्वपन सुंदरियां तीस सेकंड में आकर बता जाती हैं। फिर क्या करें ? इसीलिए विज्ञान और तकनीक की मदद से बीचवाला का बुद्ध का रास्ता (मध्यम मार्ग ) निकाला जाए तो ही बेहतर है।

आज से दस वर्ष पूर्व R.O. की टेक्नोलॉजी एक दुर्लभ और दूर की कौड़ी होती थी जो कि सिर्फ बड़े बड़े दुबई के शेखों , प्रधानमंत्रियों और राष्ट्रपति आवासों में शान के अफ़साने के जैसे दिखाई जाती थी। लेकिन बाजार के पसार के आगे अब यह घर घर सुलभः है तकनीक बुरी नहीं है लेकिन यह तकनीक भी डोमेस्टिकेशन मांगती है अब जानिये कैसे ?


फ्रिज के पानी और मटके के पानी में फर्क

सबसे पहले मैं बात करूंगा के फ्रिज के पानी और मटके के पानी में जो स्वाद का फर्क होता है वो क्यों होता है , दुसरे मटके के ठन्डे जल में संतुष्टि क्यों प्राप्त होती है और फ्रिज का पानी पेट में पत्थर के जैसे क्यों बजता है। मिटटी का मटका असल में एक सम्पूर्ण यंत्र हैं जिसकी एनर्जी एफिशिएंसी करोड़ों अरबों गुना है। दरससल एक मिटटी के मटके में खरबों महीन छिद्र होते हैं और यह छिद्र महीन कैपलारियों के जैसे होते हैं जिनके एक कोने पर जल राशि और दुसरे सिरे पर शुष्क हवा होती है।

हवा की रगड़ से कैपलरी के अंदर दबाव बनता है और पानी बाहर की और आता है हवा की शुष्कता से पानी उड़ने लगता है और पानी में ऑक्सीजन घुलने लगती है और पानी ठंडा भी होने लगता है (याद कीजिये एक ब्रांड आया था ऑक्सीरिच जो तकीनीकी उलझनों के चक्कर में फेल हो गया ), जब आप मटके के ठन्डे जल का सेवन करते हैं तो आपके मुहं की बक्क्ल कैविटी में जीभ के आसपास मौजूदा रक्त कोशिकाएं जैसे ही ऑक्सीजन घुले पानी के संपर्क में आती हैं तो शरीर का समूचा तंत्र वाह वाह कर उठता है और संतुष्टि का आभास करवाता है। यदि यही पानी हाथों की ओक बना कर पिया जाए तो हथेली में मौजूद तंत्रिकाएं भी आपको सुख देती हैं।


फ्रिज की तकनीक पानी को “कोओफ़फिसिएंट ऑफ़ परफॉरमेंस” मानक के आधार पर आपका जल ठंडा करती है और बहुत अधिक ऊर्जा खाती है। जल का केवल तापमान कम होता है और हमारे पेट में जो अग्नि प्रदीप्त रहती है उसके ऊपर जब ठंडा जल गिरता है तो वास्तव में पत्थर के जैसे बजता है दुष्परिणाम बहुत सारे हैं जिनमें से सबसे बड़ा है “कब्ज ” इससे कोलेस्ट्रॉल और बाकी सारी बीमारियाँ जुडी हुई हैं।

अब जरा R.O. के बारे में जान लेते हैं, रिवर्स ओसमोसिस नाम तकनीक में एक बहुत महीन जाली अंदर से पानी को दबाव से निकाला जाता है। यहाँ तक बात बिलकुल सही है लेकिन ज्यादा सयानों ने इसी तकनीक में UV लैंप नामक एक चीज और जोड़ दी है। दरअसल अल्ट्रा वायलेट किरणे हरेक जीवित बैक्टीरिया को प्राणदंड देने में सक्षम हैं लेकिन ये जब किसी बैक्टीरिया को मारती हैं तो उसके नन्हे शरीर में मौजूद डी.एन.ए. में म्यूटेशन करके प्रोटीन को डी नेचर ( स्वरुप बदल ) कर देती हैं जब हम यह पानी पीते हैं तो हमारे पाचन तंत्र में मौजूद रिसेप्टर इन नए प्रकार की प्रोटीनों को पहचान नहीं पाते और शत्रु समझ कर एंटीबाडी बनानी शुरू कर देते हैं बस यही कैंसर के सफर का स्टेप -1 है।

हम क्या कर सकते हैं?

घबराने की जरूरत नहीं है, एक बढ़िया मटका या मटकी घर में ले आओ और सीधे R.O. के नीचे रख दीजिये। R.O. का पानी रात को भर दो मटके में। एक काम और करो एक शुद्ध चांदी का 25 से 50 ग्राम का टुकड़ा सुनार से यह कह कर ले आओ भाई ये पानी के मटके में डालना है कोई मिलावट नहीं चाहिए और पूर्णतया शुद्ध होना चाहिए

साथियों U.V. लैंप जो तकलीफ दे रहा था उसको ये ऑक्सीजन से भरपूर पानी ठीक कर देगा चाँदी थोड़ी थोड़ी घुल कर आपके शरीर में जा कर बहुत काम करेगी। दोस्तों इतिहास गवाह है के जब सिकंदर हिन्दुस्तान की सर जमीन पर आया तो उसके लश्कर को सबसे बड़ी तकलीफ मलेरिया और हैज़ा जैसी वाटर बोर्न बीमारियों ने दी थी सिकंदर अपने आम सैनिकों के साथ बैठ कर मिटटी के बर्तनो में भोजन करता था जबकि उसके अधिकारी सोने चांदी के बर्तनो में भोजन करते थे चांदी के लगातार संपर्क में रहने से अधिकारी वर्ग बिमारियों से बचा रहा और सैनिक और सिकंदर हैजे जैसी बिमारियों से लपेटे गए।

साथियों हम लोग एक प्रकार से स्वर्णिम काल में रह रहे हैं जहाँ हमारे पास भूतकाल का पारम्परिक विज्ञान के साथ साथ आधुनिक विज्ञान की समझ समझ भी है सबसे ख़ास बात हम लोग इंटरनेट से भी जुड़े हैं सभ्यता को यदि जीवित रहना है तो कुम्हार बचाने पड़ेंगे कुम्हार की कृपा के बिना एक पल भी शांति और सुख का नहीं है भारत की पुरातन संस्कृति और पारम्परिक विज्ञान के भरोसे हम अपना और अपने बच्चों का जीवन जीने समझ और परख से आसान और सुखमय बना सकते हैं

वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन इस बारे में क्या कहता है ?

वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन जिनेवा स्विट्ज़रलैंड ने इस विषय पर एक बेहतरीन दस्तावेज पब्लिश किया है जिसमें वैज्ञानिक ढंग से यह बताया गया है कि सिल्वर किस तरह से कौन कौन से बैक्टीरिया को पानी में खुद ही टैकल करने में प्रभावी है।

डॉक्यूमेंट का टाइटल है Silver as a drinking-water disinfectant और इस लिंक पर क्लिक करके डाउनलोड करके विस्तार से पढ़ा जा सकता है।

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