पूंजी के पहाड़ से निकलेगा किसानों और कारीगरों की समस्या का समाधान।

मसला

आज दुनिया अब ऐसे दौर में पहुंच चुकी है जहां सब कुछ पूंजी के सहारे चल रहा है और बड़े बड़े आर्थिक किले हमारे चारों और उद्योगपतियों ने बनाये हैं जिनकी मदद से वो सुबह शाम दिन रात अपने प्रोडक्ट्स एवं सर्विसेज के माध्यम से पैसा खींच रहे हैं।

ग्रामीण इकॉनमी में पैसा आता तो है लेकिन रुकता नही है क्योंकि सुबह आँख खुलते ही व्हाट्सएप्प का स्टेटस चेक करने के साथ ही खर्चा होना चालू हो जाता है और फिर वो सुबह की चाय हो या नहाने का साबुन शैम्पू आदि हों हरेक वस्तु शहर से आती है और जिसकी कीमत होती है और उस कीमत में सरकार समेत अनेक हिस्सेदार होते है।

सरकार को टैक्स मिलने के कारण ब्यूरोक्रेटिक व्यवस्था दिन रात इसी जुगत में रहती है कि गांवों से पैसे खींचने की दर में कैसे बढ़ौतरी की जाए ताकि इधर देश का जीडीपी बढ़े और सब काम सोखे हो जाएं और सरकार को खर्चा करने के लिए मोटा माल हमेशा उपलब्ध रहे।

आज आप किसी भी गांव में मौजूद किसी भी दुकान का सर्वेक्षण करें तो आप यह पाएंगे कि गांव में बनी हुई कोई भी वस्तु उस दुकान में नही मिलती है। सब कुछ जो गांव में बिक रहा है वो शहर से आ रहा है। फिर गांवों ने तरक्कियां करनी कैसे हैं। यह डिज़ाइन ही ऐसा बनाया गया है व्यवस्था के द्वारा।

किसान खेतों ने फसल उगाता है जिसमें वो जमीन की तैयारी से लेकर फसल को मंडी ने ले जाने तक विभिन्न इनपुट्स, यंत्रों और डीज़ल आदि पर निर्भर रहता है जिससे हरेक स्टेप पर उसका खर्चा होता है। जब फसल कट कर सामने आती है तो उसके सर पर बहुत सारी देनदारियां खड़ी होती हैं।

उसके पास मंडी में जा कर फसल दे आने के सिवा कोई और दूसरा चारा नही होता है। मंडी की कहानियां तो आप सभी मेरे से बेहतर जानते हैं ही। इन्ही अनेक वजहों से ग्रामीण इकॉनमी निरंतर डूब रही है। जिसका नतीजा चारों तरफ मची है तौबा है।

यदि हम समस्या की तरफ गौर करें तो बस सिर्फ इतनी सी है कि ग्रामीण इकॉनमी में आने वाले पैसे धन और माया बड़ी तेजी से फिसल जाते हैं और फ्लश हो जाते हैं। धन से ही धैर्य उत्तपन्न होता है। लेकिन धन को रोकने का कोई उपक्रम या उपाय हमारे ग्रामीण इलाकों आम किसान के द्वारा न किये जाने के कारण हरसाल स्थिति और खराब हो रही है।

अपने पास रास्ता क्या है?

भारत सरकार ने साल 2002 में पहली बार भारत के किसानों को अपनी पूंजी जोड़ कर पूंजी का पहाड़ बनाने का अधिकार प्रोड्यूसर कम्पनी के माध्यम से दिया। लेकिन किसानों में जागरूकता के अभाव के कारण किसान इसमें कुछ खास नही कर पाए। आज 19 साल बीत जाने के बावजूद भी ज्यादातर जगह पर अभी किसान पूछते ही घूम रहे हैं।

कैसे बनाएं पूंजी का पहाड़

कुछ लोग मिलकर यदि रेगुलर इन्वेस्टमेंट की आदत डालें तो कुछ सालों के अंदर एक बड़ी पूंजी एकत्र करके पूंजी का पहाड़ बनाया जा सकता है। सवाल यह उठता है कि इन्वेस्टमेंट को जमा कहाँ करें यह बात ज्यादातर लोगों को नही पता है और यदि पता लग भी जाए तो उस इन्वेस्टमेंट को सुरक्षित कैसे रखा जाये और उसे कैसे उपयोग में लाया जाए और फिर उसे कैसे एक आर्थिक किले में बदला जाए यह सारी बातें आज हम इस लेख के माध्यम से आपके साथ करने वाले हैं ।

यदि गाँवों में रहने वाले एक हज़ार किसान और कारीगर सभी इक्कठे हो जाएँ और एक प्रोड्यूसर कम्पनी या एल.एल.पी. का गठन कर लें और हर महीने सौ सौ रुपये इक्कठे करके जमा करने शुरू करें तो हर महीने एक लाख रुपये एकत्र किये जा सकते हैं और बारह महीनों में यह पूँजी बारह लाख हो सकती है और आठ वर्षों में यह पूँजी एक करोड़ रुपये बन जाएगी।

यदि यह पूँजी जोड़ने की आदत निरंतर बनी रहे तो एक बड़ा पूँजी का पहाड़ निर्मित हो जाएगा जिसमें सभी का आधिकारिक तौर पर घोषित एक हिस्सा होगा जो स्थानीय तौर पर आर्थिक किला बनाने में काम आयेगा ।

पूँजी का पहाड़ कैसे काम आएगा

आप और हम पहले ही इस बात की चर्चा कर चुके हैं कि अर्बन इकॉनमी दिनरात रूरल इकॉनमी से अपनी मैन्युफैक्चरिंग की काबलियत और अपने प्रोडक्ट्स एंड सर्विसेज के माध्यम से पैसे खींच रही है हरेक आदमी मजबूर है क्यूंकि वो अकेला कुछ नही कर सकता है उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए एम.आर.पी. पर सामन खरीदना ही पड़ता है जिसमें उसका बिल आता है यह स्थिति सभी को महंगी पड़ती है और ग्रामीण इकॉनमी में पैसा रुकता नही है।

इसके अलावा यदि कोई समान गांवों में मैन्युफैक्चर हो रहा हो और उसे मार्किट में भेजना हो तो उसके लिए पूँजी और स्किल सेट की आवश्यकता पडती है जिसका जुगाड़ करते करते बस हरेक एंटरप्रेन्योर की उम्र बीत जाती है अक्सर उसकी कड़ लग ही जाती है।

पूँजी के सरकारी पहाड़ यानी के बैंक कभी भी आम आदमी के काम नही आते हैं ये सेविंग्स इक्कठी कर तो लेते हैं और उस पैसे को उद्योगपतियों के लिए शहर में ले जाते हैं और उसके आगे का खेल तो अब सभी जान ही चुके हैं।

पूँजी जैसे ही जमा होनी शुरू होगी तो सबसे पहले ऐसे खर्चे जो सभी को करने पड़ते हैं उन्हें ढूंढ कर उसमें डिस्ट्रीब्यूटर मॉडल को विकसित किया जा सकेगा जिसमें कम से कम बीस से तीस प्रतिशत की गुंजाईश रहेगी और उस प्रोडक्ट या सर्विस के वितरण से पैसे को एक रूट से घुमाया जा सकेगा जिससे बिजनेस वॉल्यूम जेनरेट होगा।

प्रोफेशनल्स की लेनी होगी मदद

जैसे ही पूँजी जमा होनी शुरू होगी सबसे अच्छी बात यह होगी कि पूँजी एकत्र करने वाला मानव समूह प्रोफेशनल्स जैसे चार्टेड एकाउंटेंट्स , कम्पनी सेक्रेटरी आदि की मदद ले सकेगा जिससे समय समय पर इंटरनल ऑडिट और स्टेट्युटोरी ऑडिट की मदद से पूँजी की सुरक्षा और रखरखाव करके पूँजी को निरंतर चढ़दी कला में रखा जा सकता है ऐसा करने से बेहतरीन फिनांशियल प्रोफाइल बनाया जा सकेगा जिसका बहुत लाभ होगा।

आर्थिक संगठन में एक दूसरे के प्रति रैवैया कैसा होना चाहिए

यह सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि आर्थिक संगठन में सदस्यों का एक दूसरे के प्रति भाव रैवैया बर्ताव कैसा होना चाहिए एक बात तो सभी को अपने मन से यह निकाल देना चाहिए कि समाजिक रूप से जुड़े इस आर्थिक संगठन में चार्टेड अकाउंटेंट , कम्पनी सेक्रेट्री और भारतीय कम्पनी अधिनियम की अनुपालना के चलते इसमें कोई घपला हो जाएगा या कोई पैसे लेकर भाग जाएगा यह संभव नही है।

एक दूसरे से बर्ताव के बारे में बात करने के लिए मेरे पास एक पौराणिक कथा है जो इस मामले में संदर्भ स्थापित करने के लिए मुझे ठीक लगती है एक बार की बात है पुराने समयों में देवासुर संग्राम चलता ही रहता था देवताओं और असुरों में कितना भी जूत बजा हो बेशक लेकिन वो ब्रहमा जी से आपस में जुड़े ही रहते थे और अपने मसलों पर चर्चा करते रहते थे ।

एक बार की बात है कि असुरों का डेलिगेशन ब्रह्मा जी के पास आया और रूटीन बातचीत में देवताओं का जिकरा चल पड़ा असुरों के चीफ ने ब्रह्मा जी से कहा कि हमने यह महसूस किया है कि आप देवताओं की तरफदारी कर लेते हैं कभी कभी इसपर ब्रह्मा जी ने कहा कि भाई ऐसा नही है आप लोगों को लगता है जबकि मेरे पास आप दोनों समूहों में से जब भी कोई आता है तो मैं अपनी ओर से अच्छी सलाह ही देता हूँ ।

ब्रह्मा जी ने असुरों के चीफ से कहा कि आप कल सुबह अपना एक डेलिगेशन लेकर आ जायें कल मैं इस विषय पर आपके साथ विस्तार से बात करूंगा और ब्रह्मा जी ने असुरों के जाने के बाद देवताओं के चीफ के पास भी एक डेलिगेशन लेकार आने के लिए आमंत्रित कर दिया ।

अगले दिन सुबह जब असुर पहले से बताये गये समय पर पहुँच गये और ब्रह्मा जी ने असुरों के चीफ से कहा कि आप पहले सभी भोजन कर लें सभी को एक बड़े स्थान पर ले जाया गया और जब सभी बैठ गये तो सभी के सम्मुख भोजन की थालियाँ पकवानों से सजी रख दी गयी इससे पहले असुर भोजन करना शुरू करते ब्रहमा जी प्रकट हुए और सभी से कहा कि आज के भोजन की एक शर्त है कि आपने भोजन तो करना है लेकिन कोई हाथ नही मोड़ सकता है ।

सभी असुरों ने अपने चीफ की ओर देखा तब चीफ ने कहा कि कोई बात ही नही है उसने अपने हाथ पीछे पकड़ लिए और झुक कर खाना खाने लगा उसे देख कर सभी असुर ऐसे ही खाने पर टूट पड़े ऐसा करने से एक अजीब सा नजारा प्रस्तुत हो गया बस जैसे तैसे भोजन निबटा और असुरों के पूरे डेलिगेशन को हाथ धुला कर एक कक्ष में बैठा दिया गया।

थोड़ी देर के बाद देवताओं का डेलिगेशन भी वहां आ पहुंचा और उन्हें भी ऐसे ही भोजन के लिए ले जाया गया और सभी के सामने थालियाँ परोस दी गयी और ब्रह्मा जी ने सभी वो वही शर्त दोबारा बता दी कि आपने खाने के लिए हाथ नही मोड़ना है ।

देवताओं के चीफ ने तुरंत दिमाग लगया और अपने साइड में बैठे हुए देवता की ओर घूम गया और थाली भी साथ ही घुमा ली और अपनी थाली से भोजन का कौर उठा कर बिना बाजू को मोड़े हुए सामने बैठे हुए देवता के मुहं में डाल दी और उसे खिलाने लगा ।

बस बाकी सभी देवतागण भी इस युक्ति को समझ गये और एक दूसरे को बिना बाजू मोड हुए भोजन कराने लगे बिना कोई भोजन गिराए हुए बड़े ही सुंदर तरीके से सभी देवताओं ने भोजन कर लिया इस पूरे नजारे को अंदर कक्ष में बैठे बैठे असुरों के डेलिगेशन ने भी देखा और देवताओं की युक्ति की तारीफ की ।

भोजन हो जाने के बाद ब्रह्मा जी ने असुरों और देवताओं को अपने सामने बैठाया और कहा कि हमेशा युक्ति पूर्वक सभी कार्य करने चाहिए जिससे सभी का भला हो असुरों को भी समझ में आ गया कि उनकी बुरी हालात का कारण क्या है।

दोस्तों प्यारों किसानों और कारीगरों के आर्थिक संगठनों में एक दूसरे के प्रति यही रैवैया होना चाहिए कि एक भाई काम करेगा तो तो उसका फायदा दूसरे सदस्य को होगा केवल इसी भावना के साथ ही आर्थिक संगठन कामयाब हो सकता है।

पूँजी के सहारे कौन कौन से काम मिल जुल कर किये जा सकते हैं ?

किसान कम्पनी के सदस्यों द्वारा फसलोत्पादन, कटाई , फसलों की खरीद , ग्रेडिंग , फसलों को एकत्र करना , फसलों को ढोना , फसलों का विक्रय करना , फसलों का विपणन करना।

किसान कम्पनी के प्राइमरी सदस्यों के प्राइमरी फसलोत्पादन को एक्सपोर्ट करना तथा किसान कम्पनी के प्राइमरी सदस्यों के उपयोग अथवा उपभोग हेतु प्रोडक्ट अथवा सर्विसेज को इम्पोर्ट करना।

इसके अलावा किसान कम्पनी खुद या अपने किसी एजेंट या इंस्टीटूशन के माध्यम से निम्नलिखित कार्य कर सकती है।

किसान कम्पनी के प्राइमरी सदस्यों के द्वारा उत्पादित फसलों की प्रोसेसिंग जिसमे प्रिजर्व करना, सुखाना , डिस्टिल (आसवन करना), शराब बनाना, डिब्बा बंद करना आदि शामिल है ।

किसान कम्पनी द्वारा अपने सदस्यों को कोई यंत्र या मशीनरी या कोई कंज्यूम की जा सकने वाली कोई वस्तु बनाना या सप्लाई करना।

किसान कम्पनी के द्वारा अपने सदस्यों या दूसरे किसानों के लिए आपस में मिलजुल कर काम करने और एक दूसरे की मदद करके आगे बढ़ने जिसे म्यूच्यूअल अस्सिटेंस प्रिंसिपल भी कहते हैं के लिए प्रशिक्षण प्रदान करना और करवाना।

किसान कम्पनी के द्वारा अपने प्राइमरी सदस्यों को खेती बाड़ी से जुडी तकनीकी सेवाएं प्रदान करना , कंसल्टेंसी सेवाएं प्रदान करना , प्रशिक्षण , अनुसंधान और विकास और अन्य सभी सम्बंधित गतिविधियां जिनसे किसान कम्पनी के सदस्यों का फायदा हो और खेती किसानी में वृद्धि हो।

बिजली बनाना, बिजली को तारों के माध्यम से ले जाना, बिजली को बांटना (बेचना), खेती लायक जमीन की उपजाऊ क्षमता को ठीक करना, जल संसाधनों का रखरखाव करना , उनका प्रयोग करना , उनका संरक्षण करना , उनका प्रचार प्रसार करना ताकि किसान कम्पनी के सदस्यों द्वारा प्राइमरी प्रोड्यूस यानि फसलोत्पादन में बढ़ौतरी हो ।

किसान कम्पनी के सदस्यों और फसलों (प्राइमरी प्रोड्यूस) का बीमा करना।

किसान कम्पनी के द्वारा अपने सदस्यों के बीच में आपसी लेन देन और सदस्यों में एक दूसरे की मदद करने की भावना को प्रोत्साहित करना ताकि खेतीबाड़ी का प्रबंधन अच्छे तरीके से किया जा सके।

किसान कम्पनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स द्वारा लिए गए फैंसलों के अंतरगर्त सदस्य किसानों की भलाई हेतु कार्य करना और सुविधाएं प्रदान करना।

किसान कम्पनी के द्वारा अपने सदस्यों को खेतीबाड़ी पशुपालन आदि क्रिया कलापों के लिए धन उधार देना , फायनेंस की व्यवस्था करना ताकि सदस्य अपनी फसलों की प्रोसेसिंग , मार्केटिंग आदि अच्छे से कर सकें।

किसान कम्पनी केवल अपने सदस्य किसानों जो एक्टिव हैं और कम्पनी की गतिविधियों में भाग लेते हैं फसलोत्पादन खरीद सकती है।

प्राइमरी प्रोड्यूस क्या होता है ?

किसानों द्वारा उत्पादित किये जा सकने वाला कोई भी उत्पाद जिसे खेती बाड़ी,पशुपालन ,फल सब्जी,फूल उत्पादन , मछली पालन , अंगूर उत्पादन, जंगलात के तहत पेड़ लगाना , जंगल में पैदा हो रहे उत्पादों को एकत्र करना , पेड़ काटी गयी जमीनों पर फिर से पेड़ लगाना और उनके उत्पाद एकत्र करना , बनाना, मधुमक्खी पालन करना , कोई भी ऐसी गतिविधि जिसमें कुदरती तरीके से प्राकृतिक उत्पादों को पैदा किया जा सकता है , या फिर कोई भी ऐसी गतिविधि का संचालन करना जिसमें उत्पादकों या उपभोक्ताओं को प्रोत्साहित किया जा सकता है।

हैंडलूम यानि हथकरघा , हस्तशिल्प , या घरेलू स्तर पर कोई छोटी यूनिट लगा कर उत्पादन करके बनाई जाने वाली वस्तु प्राइमरी प्रोड्यूस कहलाती है।

ऊपर बताई गयी अनेक गतिविधियों के तहत उत्पादित उत्पादों से फार्म स्तर या घरेलू स्तर पर बनाये जा सकने वाले उत्पाद को भी प्राइमरी प्रोड्यूस कहते हैं

उपसंहार

सारी बातों का निचोड़ यही है कि समाज में पूँजी का एक पहाड़ स्थानीय स्तर पर रेगुलर इन्वेस्टमेंट के माध्यम से खड़ा किया जाए और फिर धीरे धीरे उसका उपयोग सदस्यों के द्वारा बनाये उपजाए सामान को मार्केटिंग करने में उपयोग किया जाना चाहिए। इस उपक्रम के माध्यम से हम समाज में आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकता है।