औद्योगिक राष्ट्र भारत के पुनर्जागरण का सबूत है देसी ब्रांड त्रिंजन

भारत कभी भी कृषि प्रधान देश नही था। भारत की गली गली घर घर में इंडस्ट्री थी। भारत में कोई भी जगह ऐसी नही है जहां की कोई चीज मशहूर न हो।पुराने किसान बताते हैं कि अक्टूबर से मार्च तक उन्हें सर उठाने तो दूर मरने की भी फुर्सत नही मिलती थी क्योंकि गुड़ बनाने का काम बहुत जोरशोर और दिल लगा कर किया जाता था।

कृषि का सारा सामान परिष्कृत रूप में गांव से बाहर निकलता था। किसान का पूरा परिवार मूल्यवर्धन और संबंधित व्यवस्थाओं में लगा रहता था।पंजाब के फरीदकोट जिले के कोटकपूरा टाउन में रहने वाले सरदार गुरनाम सिंह जी और मैडम मनजीत कौर अपने पारंपिक व्यवसाय को आज भी बड़े शौक़ से जीवित रखे हुए हैं।

खेती विरासत मिशन पंजाब इनके साथ लग कर एक कैटालिस्ट की भांति इन वैज्ञानिकों और इंट्रप्रेन्युर्स को आर्थिक रूप से सबल रखने के लिए प्रयास कर रहा है।सरदार गुरनाम सिंह जैसे कला के धनी लोग हमारे देश मे गली गली घर घर थे जो क्लीन और ग्रीन टेक्नोलॉजीज के आधार पर उद्योग स्थापित किये हुए थे।इन्ही कलाकारों के दम पर भारत का जीडीपी दुनिया मे सर्वाधिक था।

माता गुरचरण कौर 60 वर्ष की आयु में भी अपने घर पर तौलिया निर्माण उद्योग चलाती हैं।इसी साल फरवरी में युवा पुत्र की एक्सीडेंट में मृत्यु हो जाने पर पूरे परिवार को संभाल रही हैं। पंजाब राज्य के जिला मुक्तसर के पिंड कोटली में तकरीबन ऐसी बीस खड्डियाँ हैं जो महिलाएं अपने पारम्परिक हुनर से चलाती हैं।

हमारे देश मे जितनी भी हुनरमंद वैज्ञानिक और इंट्रप्रेन्युर् कौमें थी उनको नए संविधान में एक योजना के तहत पिछड़ा घोषित किया गया है दो टके की नौकरी के लालच को आगे रख कर जो कभी मिलती नही है।कामगार और कारीगर का जब तक समाज मे सम्मान स्थापित नही किया जाएगा देश का सुधार सम्भव नही है।माता गुरचरण कौर जी का हौंसला काबिले तारीफ हैं। खेती विरासत मिशन जैतो फरीदकोट पंजाब माता गुरचरण कौर जी के प्रयासों को एक दिशा देने का जतन कर रहा है।

माता हरबंस कौर उनकी बेटी हरजिंदर कौर और उनकी बेटी सरबजीत कौर फ़टी पुरानी चद्दरों, सूटों चुन्नियों से दरी निर्माण में सिद्धस्त हैं।घर पर ही एक पारंपरिक दरी बनाने का अड्डा मौजूद है। जिन कपड़ों से दरी बनानी है उनकी पहले लीरें बनाई जाती हैं फिर उन लकीरों से गड्डियां बनाई जाती हैं। यह काम बच्चों का होता जिसे सरबजीत कौर अपनी दूसरी बहन रमजोत के साथ निबटाती है।

इसी परिवार की छोटी बिटिया सुखबीर कौर ने घर मे ही मौजूद पीढ़ी से अपनी मां और नानी की भांति एक छोटे अड्डे का निर्माण कर लिया और एक छोटी सी दरी बनाई।खेती विरासत मिशन पंजाब इनसे दरियां खरीद कर उन्हें बाजार उपलब्ध कराने का काम कर रहा है। के वी एम से जुड़ी इस प्रोजेक्ट जिसे त्रिंजन का नाम दिया गया है कि कोऑर्डिनेटर Rupsi Garg जी कहती है कि इस परिवार का कार्य दरी बनाने में सुपर फाइन है और इनकी कोई रीस नही है।