माता सीता के जीवन से हम क्या सीख सकते हैं

सुनीता बिंदल

माता सीता सनातन इतिहास में एक आदर्श महिला हुई हैं जिन्होंने मर्यादा पुरुषोतम भगवन श्रीराम की जीवन संगिनी बनकर उनका हर कदम पर साथ दिया आज के समय में सीता के जीवन से हम क्या सीखा सकते हैं इस बाबत आज हम कुछ चर्चा करेंगे सीता जी का तो पूरा जीवन ही त्याग व प्रेम से भरा हुआ है , उनका पूरा ही जीवन हमारे लिए शिक्षाप्रद व प्रेणादायक है सीता के बहुत सारे गुण जो हमको भी सीखने चाहिए।

प्रकृति प्रेम

सीता प्रकृति से बहुत प्रेम करती थी, बाल्यकाल से ही वो मिट्टी में लिपटी चिपटी रहती थी, मिट्टी से खेलती , उनसे सुंदर सुंदर आकृतियां बनाती , देवी देवताओं की मूर्तियां बनाती वो अपने रसोईघर से सब्जियों व फलों के बीज उठा कर महल के उपवन में पहुंच जाती और उनको मिट्टी में रोप देती फिर से नवजीवन देने के लिए , ताकि वो फिर से पौधे बन जाये , उनको सींचती ,उनकी देखभाल करती। सीता जी को जड़ी बूटियां, पेड़ पौधों की बहुत अच्छे से पहचान थी इस प्रकार हमको सीता के इन कार्यो से यही सीख मिलती है कि हमको भी प्रकृति से प्रेम करना चाहिए। अलग अलग ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने चाहिए ,उनको कटने से बचाना चाहिए , क्योंकि इन पेड़ पौधों से हमको ढेरों जीवनोपयोगी चीजें मिलती है , फल ,फूल ,छाया , बारिश , जड़ी बूटी, औषिधियाँ प्राप्त होती है।

सीता का तो जन्म ही भूमि से हुआ था , जिसकी वजह से वो धरती की धड़कनों को भी पहचानती थी।
वो कोसो दूर से आती हुई पदचाप को सुन लेती थी, पशु पक्षियों की भाषा समझती थी , हवाओं का रुख पहचानती थी , पेड़ पौधे लताओं से बातें करती थी , जिसकी वजह से वो आने वाले संकट को भी पहले से भांप लेती थी ,प्रकृति आपदा का उनको पहले से ज्ञात हो जाता था।


जैसे एक बार राम वनवास के समय जब वो लोग चित्रकूट में मंदाकिनी के किनारे पर जहां लक्ष्मण ने अपनी कुटिया बनाने की सोची। सीता ने जगह दिशा को देख लक्ष्मण को वहां कुटिया बनाने से मना किया, लेकिन लक्ष्मण नहीं माने कि भाभी ये बहुत सुंदर मनभावन जगह है , हम यहीं कुटिया बनाएंगे , सीता उनको समझा नहीं पाई कि ये जगह सही नहीं है।

तब सीता ने सोचा कुछ बातें समझाने से समझ नहीं आती, कुछ बातों को समय या परिस्थितियां ही समझाती है और ये सोचकर लक्ष्मण को वहां कुटिया बनाने दी और हुआ भी यही रात में नदी में उफान आया, जो सीता को समय रहते धरती की धड़कने सुनने से , हवाओं का रुख देखकर , पानी का बहाव पहचान कर , पता चल गया कि कुछ होने वाला है । उन्होंने दोनों भाईयों को वहां से उठाया , वो उनको अपने साथ वहां से दौड़ते हुए किसी ऊंचे सुरक्षित स्थान पर ले गयी, जिससे उन सबकी जान बची और देखते ही देखते उनकी आंखों के सामने उनकी कुटिया बह गई।

तब श्रीराम और लक्ष्मण सीता का प्रकृति को पहचाने का ये गुण देख कर बहुत प्रभावित हुए , उसके बाद लक्ष्मण ने पूरे वनवास काल में हर कार्य सीता की सलाह से ही किये। हम ये भी कह सकते हैं कि राम लक्ष्मण के चौदह वर्षों के वनवास काल काटने में सीता का बहुत बड़ा योगदान रहा। इससे हमको यही सीख मिलती है कि हमको नदियों के किनारे वाली जगह खाली छोड़ देनी चाहिए , बिल्कुल उनसे सट कर कुछ नहीं बनाना चाहिए , उनके रास्ते में कोई अवरोध उत्पन्न नहीं करना चाहिए ..
जैसे 1998 में कैलाश मानसरोवर में हुआ था , मालपा कैम्प पूरा का पूरा ही नदी में आये उफान की चपेट में आ गया था। कुछ कुछ ऐसे ही साल 2013 में केदारनाथ में भी हुआ था , उस समय भी कितनी ज्यादा जान माल की हानि हुई थी।

सवाल पूछना

सीता जब छोटी थी बहुत जिज्ञासु थी ,सीता अपने शिक्षकों , गुरुजनों ,अपने माता पिता हर किसी से बहुत ज्यादा सवाल पूछती थी , उनके सामने कोई चर्चा आती या कोई भी बात जो उनको समझ नहीं आती या जिसकी उनको जानकारी न होती वो तुरन्त पूछ लेती थी , जिससे ये पता चलता कि सीता को नई -नई बातें जानने का, ज्ञान अर्जित करने में कितनी रुचि थी। पर आज के लोग व विद्यार्थी सवाल पूछने से ही डरते है , उन्हें लगता है कि सवाल पूछने से उनकी बेइज्जती हो जाएगी और लोग समझेंगे कि उन्हें कुछ भी नहीं आता , पर ये धारणा बिल्कुल गलत है ।

आप जितना ज्यादा सवाल पूछेंगे, आपको उतना ज्यादा जवाब मिलेंगे और आपको जितना ज्यादा जवाब मिलेंगे आप उतना ज्यादा सीखोगे, आप जितना ज्यादा सीखोगे उतने ही बड़े बनोगे , और आप जितने बड़े बनोगे आपकी उतनी ही ज्यादा इज्जत होगी। अगर आप एक विद्यार्थी है तो आपके अंदर ये गुण जरूर होने चाहिए , बल्कि हम सब के अंदर ही ये गुण होने चाहिए क्योंकि सवाल के गर्भ से ही जवाब का जन्म होता है और ज्ञान बढ़ता है , जब सवाल ही नहीं होंगे तो जवाब कहाँ से आएंगे।

साहित्य प्रेम

सीता साहित्य प्रेमी भी थी , मिथिला तो था ही शिक्षा प्रधान राज्य , मिथिला में ज्ञान की गंगा बहती थी ,राजा जनक समय समय पर साहित्य संगोष्ठीयां करते रहते थे जिनमें सीता भी बचपन से ही भाग लेती थी। ये सब चीजें भी हमको सिखाती है हम सब को साहित्य प्रेमी होना चाहिए ,पुस्तको का साथ नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि पुस्तक ही हमारी सबसे सच्ची मित्र होती है। एक साहित्य ही होता है जो हमको सत्य तक पहुंचाता है। हमारी अच्छाई से पहचान करवाता है , बुराई से बचाता है , हमारी सोई चेतना को जागृत करता है , हमारा परिष्कार करता है , हमारे बेहतर जीवन पोषण में सहायक होता है।’ इसलिए हमको खत्म होते जा रहे हिंदी साहित्य को बचाने की कोशिश करनी चाहिए , पुस्तको को खरीद कर पुस्तकालयों को चलने में मदद करनी चाहिए।

सयुंक्त परिवार

सीता की जीवनी से हमको एक ये भी शिक्षा मिलती है हमको अपने बहन भाईयों , चाचा चाची, माता पिता सबका आदर करना चाहिए , सबको प्रेम करना चाहिए , उनके साथ मिलजुल कर रहना चाहिए। क्योंकि सीता जन्म से लेकर और सुसराल में अंतिम समय तक अपनी बहनों से कभी अलग नहीं हुई
मायका हो या सुसराल हमेशा सयुंक्त परिवार में रही। आज जो परिवारों में अकेले अकेले रहने की परंपरा पड़ चुकी है उसकी बजाय हमको मिलजुल एक साथ प्रेम से रहना चाहिए। रामायण में राम सीता के परिवार हमको यही सिखाते है कि एक सयुंक्त परिवार में अलग अलग चरित्र ,अलग अलग विचारों के सदस्य होते है फिर भी एकजुट रहते है मतलब विविधता में एकता।

महिला उत्थान

सीता ने महिलाओं के उत्थान के लिए बहुत कार्य किये , जैसे सीता ही थी जो सबसे पहले महिला शक्षिका को गुरुकुल तक लेकर गयी, हालांकि मिथिला एक शिक्षाप्रधान राज्य था , वहां पर कन्याओं को शिक्षा प्राप्त करने के बराबर के अधिकार थे। लेकिन कन्याएं सीता से पहले घरों में ही शिक्षा प्राप्त करती थी ,राजा जनक पहले इंसान थे जिन्होंने अपनी पुत्रियों को सबसे पहले गुरुकुल में भेज कर शिक्षा दिलवाई , और इसके बाद सीता ही थी वो जो महिला शिक्षका को सबसे पहले गुरुकुल तक लेकर गयी । देवी गार्गी जिनको वो अपनी गुरु मानती थी। उनको आग्रह करके वो ही गुरुकल तक लेकर गयी थी ताकि वहां पर शिक्षा देकर वो अन्य कन्याओं को भी लाभ दे सके उनका उत्थान कर सके।

इसके अलावा सीता ने ही सबसे पहले माता गौरी का मंदिर बनवाया था ,जब वो गुरुकल में पढ़ती थी तब एक बार देवी गार्गी , देवी सती व देवी गौरी की कथा सुना रही थी तब वहीं से सीता ने महसूस किया हर जगह, हर मंदिर में केवल भगवान शिव की अकेले पूजा होती है। उनके साथ माता गौरी कहीं नहीं है, तब उन्होंने अपने गुरुजनों के साथ मिलकर राजा जनक के सामने ये प्रस्ताव रखा था कि माता गौरी के मंदिर क्यों नहीं और तब सीता के कहने पर ही राजा जनक ने माता गौरी का मंदिर बनवाया था।

आपको याद ही होगा रामायण सीरियल में भी दिखाते है सीता ,माता गौरी के मंदिर में विवाह से पहले माता गौरी की पूजा करती है , वो मंदिर हमारे देश में माता गौरी का पहला मंदिर था जो सीता के कहने पर बना था। इसके अलावा अयोध्या में भी माता सीता व उनकी बहन मांडवी बगैरा ने प्रयास किये महिलाओं को शिक्षित करने में इन सब बातों से हमको यही शिक्षा मिलती है।

हमको महिलाओं के उत्थान के लिए ज्यादा से ज्यादा कार्य करने चाहिए , कन्याओं की शिक्षा , महिला शक्षिका , महिलाओं के ज्यादा से ज्यादा आगे बढ़ने के प्रयास करने, उनको उत्साहित करने पर जोर देना चाहिए , और इसके साथ ही जहाँ भी किसी महिला को कष्ट में देखे , किसी का शोषण होते देखे तो हमको हर प्रयास उनकी मदद करनी चहिये।

एक महिला जब दूसरी महिला का साथ देती है तो किसी भी बड़ी से बड़ी ताकत में ये हिम्मत नहीं होती कि किसी महिला को नुकसान पहुंचा सके और साथ ही हमको इस धारणा को गलत साबित करना होगा कि एक महिला ही दूसरी महिला की दुश्मन होती है। क्योंकि अक्सर ये देखने को मिल ही जाता है जब हम किसी को देर रात बाहर देखें ,किसी को अकेले कहीं आते जाते देखें तो ये कह बैठते है ये आवारा है ,ये चरित्रहीन है ये सब नहीं होना चाहिए, उनके बढ़ते कदमों को न रोक उनको आगे बढ़ने में मदद करें।

पाक कला में निपुण

बाल्यकाल से ही सीता की माता सुनयना अपनी सभी पुत्रियों को अपने साथ पाकशाला में रखती थी उनको भोजन बनाना तो सिखाती ही थी साथ ही उत्तम भोजन के गुणों के बारे में जानकारी देती थी। सीता का यही गुण आगे चलकर उनके काम भी आया उनका पूरा जीवन ही वन में बीता जिससे उनको स्वयं भोजन बनाने में कभी कोई कठिनाई नहीं आयी, उन्होंने पूरे वनवास काल में राम व लक्ष्मण को कभी भूखे नहीं रहने दिया , वो कहीं से भी जुगाड़ कर ही लेती थी।

उनको पहचान थी कहाँ मिट्टी के नीचे से शकरकंद निकलेगा , कहा कचालू , कुछ भी करके वो भोजन का प्रंबन्ध कर ही लेती थी। इससे हमको यही शिक्षा मिलती है चाहे हम कितने भी पढेलिखे हो, कितने ही धनवान परिवार से हो, कितने ही घरेलू कर्मचारी हो हमारी मदद के लिए लेकिन हमको स्वयं भी सब कार्य करने आने चाहिए ।

पता नहीं किस वक्त कब क्या जरूरत पड़ जाए , भविष्य का किसी को नहीं पता और वैसे भी स्त्रियों को तो अन्नपूर्णा माता कहा जाता है और ये भी कि किसी के दिल का रास्ता पेट से होकर जाता है, इसलिए हमको कोशिश करनी चाहिए अपने परिवार को अपने ही हाथों से भोजन बनाके खिलाये और ये भी कहते है कि भोजन जिस भाव से बनाया जाए भोजन में वही गुण आ जाते है, प्रेम से बनाया भोजन प्रेम को पोषित करता है गुस्से से बनाया गुस्से को। ये कहावत भी शायद इसीलिए है.. “जैसा खाया अन्न वैसे आये गुण”

सादा जीवन ऊंच विचार

जैसे हम सब जानते है सीता राजा जनक की सबसे बड़ी पुत्री थी व मिथिला देश की सबसे बड़ी व सबसे प्रिय राजकुमारी थी पर फिर भी सीता को महंगे कपड़े ,महंगे जेवर महंगे साजो श्रृंगार में रुचि नहीं थी , सीता ने हमेशा अपने ज्ञान , अपने विचारों से ही सबका दिल जीता था।

अयोध्या की महारानी होने के बाद भी सीता ने अपना जीवन बिना महंगे कपड़े , बिना महंगे साजो श्रृंगार के बिता दिया , उनका सादा जीवनशैली ही उनकी असली खूबसूरती थी हम सबको भी मातासीता से ये सीखना चाहिए कि इंसान के गुण ही उसकी असली खूबसूरती है।

इसके अलावा सीता एक राजकुमारी होते हुए भी कभी पालकियों में नहीं चली , भवन से गुरुकल हमेशा वन के रास्ते पैदल जाती आती थी ,उनकी माता उनको कभी जड़ी बूटियां कभी औषधियां , कभी पुष्प चुनने के लिए वन में भेजती रहती थी ,आगे चल कर यही सब उनके काम भी आया, उनको वनवासी जीवन जीने में कभी कोई कठिनाई नहीं हुई।

हमको भी यही सीखना चाहिए चाहे हम कितने भी अमीर हो ,कितनी भी हमारे पास सुविधाएं हो ,लेकिन हमको हर तरह के जीवन की आदत होनी चाहिए ये नही के हम कार से नीचे पांव ही न रखे ,हर समय सहायकों पर निर्भर रहें , हमको छोटे बड़े सब कार्य खुद करने की आदत होनी चाहिए ,कभी पैदल , कभी बस से कभीं रिक्शा सबकी आदत होनी चाहिए क्योंकि कब क्या समय आ जाये किसी को नहीं पता।

दया करुणा

सीता के अंदर दया करुणा के भाव कूट कूट कर भरे हुए थे , वो पशु पक्षी जानवर हो या इंसान सबके प्रति करुणा के भाव रखती थी , अगर किसी को घायल देखती तो तुरंत अपने हाथों से उनका उपचार करती , उनको औषधि मरहम पट्टी देती , कोई भूखा होता तो तुरन्त उनके भोजन का प्रबंध करती , वो किसी को भी कष्ट में देख नहीं सकती थी। उनसे हमको यही सीख मिलती है कि हमारे अंदर भी प्राणियों के प्रति प्रेम व सेवा भाव होने चाहिये।

क्रोध अंहकार पर नियंत्रण

बाल्यकाल में जब सीता को अहिल्या के बारे में पता चला कि कैसे किसी बात पर महाऋषि गौतम ने क्रोध में आकर अपनी पत्नी को श्राप दे दिया। उसके बाद एक दिन महृषि गौतम राजा जनक के भवन में आये व उन्होंने सीता को अपनी शिष्य बनाने की इच्छा जाहिर की , तब राजजनक ने सीता को बुलाया व उनको बताया महृषि गौतम तुमको शिक्षा देना चाहते है तब सीता ने महृषि से प्रश्न किया महृषि शिक्षा से क्या मिलता है क्या सीखूंगी मैं ?


महाऋषि मुस्कराते हुए कहते है वेद , उपनिषद
सीता – इन्हें सीखने से क्या लाभ होता है महाऋषि ?
तब ऋषि कहते है ! ज्ञान और ज्ञान अर्जित करना ही परमसुख की कुंजी होती है , जो ज्ञानी होते है वो अपने मन , अपनी इच्छाओं , अपनी इंद्रियों पर काबू पाना भी जानते है।

सीता पूछती इंद्रियों पर नियंत्रण पाने से क्या होता है महृषि ?
ऋषि कहते इंद्रियों पर काबू पा लेने वाला व्यक्ति अपने क्रोध पर विजय पा लेता है, अपने अहंकार पर विजय पा लेता है पुत्री फिर सीता पूछती क्या आपने सभी वेद व शास्त्रों का अध्ययन किया है महृषि ?
तो ऋषि कहते हां सीता।


तब राजा जनक भी बीच में बोलते हुए कहते है ! आर्यवर्त के सबसे प्रबुद्ध व्यक्तियों में इनकी गणना होती है सीते


तब वो बच्ची सीता उनसे पूछती है तो क्या आप अपने क्रोध व अहंकार से मुक्त हो गए है महृषि ?
हां सीता मैंने क्रोध व अंहकार पर विजय प्राप्त कर ली है।
महृषि अगर आपने क्रोध व अंहकार पर विजय प्राप्त कर ली है तो आपने अपनी पत्नी को श्राप क्यों दिया?

ये सुनकर महृषि गौतम निरुत्तर हो गए


इस प्रसंग से हमको यही सीख मिलती है अगर हमको ऋषितुल्य जीवन जीना है तो सबसे पहले क्रोध व अंहकार पर विजय प्राप्त करनी होगी क्योंकि ये दोनों ही अवगुण हमारे सभी गुणों को खत्म कर देते है।

पतिव्रता व सच्चे जीवनसाथी का अर्थ

राम के साथ शादी होने के बाद तुरन्त सीता को भी वनवास जाना पड़ा , सीता चाहती तो अयोध्या के महल में आराम से रह सकती थी पर सीता ने अपने पति राम के साथ जंगल जाना चुना। क्योंकि जीवनसाथी का मतलब सिर्फ सुखों में ही साथ रहना नहीं होता दुखो में साथ निभाना होता है । यही नहीं जब रावण सीता का हरण कर उसे लंका ले गया और सीता को लंका की महारानी बनाने का प्रस्ताव दिया तब सीता ने उनका प्रस्ताव ठुकरा कर उनका घमंड चूर कर दिया।

सीता जी ने अपने पत्नी धर्म को निभाते हुए अपने स्वामी का इंतजार करने लगी , रावण के लाख डराने के बाद भी , दुनियां के सारे सुखों का लालच देने के बाद भी सीता नहीं मानी। इससे पता चलता कि सीता बहुत महान पतिव्रता महिला थी जिसे अपने पति पर बहुत विश्वास था व सीता अपने पति का विश्वास नहीं तोड़ सकती थी ।

ये सीख दोनों ही पति पत्नी के लिए है भले ही हम सीता के जितने महान नहीं बन सकते पर अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार रह सकते है , और उनका विश्वास कभी न तोड़े , यही सच्चे जीवनसाथी के गुण होते है।

धैर्य व ईच्छाशक्ति

इतिहास साक्षी है कि सीता के अंदर कितना धैर्य व सहनशीलता थी। सीता ने कभी भी हालातों से समझौता करके हार नहीं मानी , रावण जब सीता को उठा कर लंका ले गया, दिन रात चौबीसों घण्टे 365 दिन सीता को अशोक वाटिका में एक पेड़ के नीचे बिताना पड़ा।

सर्दी हो बरसात हर मौसम में सीता ने काफी दुख झेले , पर फिर भी सीता ने रावण की एक बात भी नहीं मानी व लंका में रह कर भी पवित्र बनी रही , यही नहीं सीता जब लंका से अयोध्या वापिस लौट कर आई थी और उसके बाद उनकी प्रजा ने ही उनकी पवित्रता पर सवाल उठा दिए तब सीता ने अपने दिल पर पत्थर रख अपने परिवार।

अपने प्रिय रघुवर से ही स्वयं को अलग कर लिया ताकि वो उनके राज धर्म के आड़े न आये और उसकी वजह से उनके कुल का नाम खराब न हो और जंगल में जाकर अपना शेष जीवन व्यतीत करने लगी इससे ये पता चलता है सीता के अंदर कितनी ज्यादा इच्छाशक्ति और कितना ज्यादा धैर्य था , धैर्य स्त्रियों का गहना होता है।

पर आज के समय में हम लोगो के अंदर धैर्य बहुत कम रह गया है, जिसके कारण आजकल परिवारों में ही झगड़े फसाद होते रहते है , स्त्री हो पुरुष उनको देवी सीता से ये दोनों गुण जरूर ग्रहण करने चाहिए अगर हम चाहते है कि हमारा जीवन आसान हो जाए , सब हमारी इज्जत करें, लोग हमें पसंद करने लगे तो हमें अपने आपको धैर्यवान बनाना चाहिए। अपनी इच्छाशक्ति को प्रबल बना कर देवी सीता से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को महान बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

स्वाबलम्बी

सीता से हमको सीखना चाहिए कि हम भी स्वावलंबी बन सके। कैसे सीता ने वन में रहकर अपने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया, उनको पालपोस कर बड़ा किया। कैसे उनमें इंसानियत के गुण व संस्कार पोषित किये। कैसे उनमें बाल्यकाल से ज्ञान की गंगा प्रवाहित की , कैसे उनको छोटी सी उम्र में महान यौद्धा बनाया। कैसे उनको वन में छोटे से छोटा काम करना सिखाया। शायद सीता इस धरती की पहली सिंगल मदर थी जिन्होंने बिना परिवार व पति के अपने बच्चों को बड़ा किया।

आत्मसम्मान

हम सबको सीता से ये सीखना चाहिए पहले स्वयं हमको हमारा सम्मान करना होगा तभी दुनियां हमको सम्मान देंगी। सीता परित्याग से हमको यही सीखने को मिलता है चाहे वजह कुछ भी रही हो घर छोड़ने की , जब हमने एक बार कोई निर्णय ले लिया तो उस पर अडिग रहें जैसे सीता अयोध्या छोड़ने के बाद फिर कभी अयोध्या वापिस नहीं लौटी जब हम खुद के सम्मान की रक्षा करते है तभी ये संसार हमें सम्मान देता है।

एक बात और लोग यदा कदा इस बात पर सवाल उठाते रहते है कि राम ने सीता का परित्याग क्यों किया हालांकि ये निर्णय स्वयं सीता का था राम का नहीं। राम सीता के साथ जाना चाहते थे लेकिन सीता नहीं चाहती थी वो अपनी प्रजा के प्रति अपना कर्तव्य भूल जाये सीता परित्याग हमें राजधर्म का पाठ पढ़ाती है कि राजा का सबसे पहला धर्म क्या होता है।

राजा को निज सुख त्याग कर प्रजा की भलाई के बारे में पहले सोचना चाहिए । राम सीता से कितना प्रेम करते थे उस पर कोई शक नहीं कर सकता अगर राजधर्म की वजह से सीता को वन जाना पड़ा तो राम भी महल में रहते हुए वनवासी जीवन ही जिये। सीता की याद में कंदमूल खाना , धरती पर सोना , पूरा जीवन दूसरा विवाह न करना , उन्होंने भी पूरा जीवन एक सन्यासी के जैसे ही बिताया।

उपसंहार

एक बात और कहना चाहूंगी जब त्रेता युग में दानवी शक्तियां बहुत ज्यादा बढ़ चुकी थी और उनका नाश करने के लिए भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी ने राम व सीता के रूप में जन्म लेकर धरती को दानवरहित किया था , वही समय अब भी आया हुआ है अब फिर हम सबको एक जुट होकर अपनी सारी सनातन शक्ति को मजबूत करके उन दानवी शक्तियों का मुकाबला करना होगा अपने देश , अपने धर्म , अपने समाज की रक्षा करनी होगी

एक बात आप सब के सामने एक प्रस्ताव रखना चाहूंगी अगर हो सके तो हम सब लोग सीता नवमी को महिला दिवस के रूप में मनाएं क्योंकि माता सीता हम सबकी आदर्श है, हम सब की प्रेरणास्त्रोत है शुद्ध सरल, सात्विक, सतीत्व, स्वालंबी ,संघर्ष, शालीनता, सुदृढता ,सुंदरता ,सहृदयता का परिचायक है सीताजी का चरित्र ।

इसलिए कोई और न सही पर भारतीय महिलाएं तो ये कोशिश कर ही सकते है कि सीता नवमी को सनातन महिला दिवस के रूप में मना सकें