महाराजा रणजीत सिंह का अंतिम संस्कार

महाराजा का देहावसान

महाराजा रणजीत सिंह जी को अधरंग हुआ था और वे 27 जून 1839 को स्वर्ग सिधार गये। उनका अंतिम संस्कार 28 जून 1839 को लाहौर में हुआ था। उनकी चार रानियाँ और सात दासियाँ महाराजा के मृत शरीर के साथ चिता पर सती हुई थी। महाराजा रणजीत सिंह जी का राज भारत में खालसा राज के रूप में सर्वमान्य है। सिख गुरुओं ने हमेशा सती प्रथा का विरोध ही किया है सभी गुरुओं ने इसके बारे में खुल कर अपने विचार रखे हैं। यह ऐतिहासिक घटना किन हालातों में घटी उसके बारे में ज्यादा इनफार्मेशन उपलब्ध नही है लेकिन यह घटी थी यह सत्य है।

चशम्दीदों के बयानात

लेफिटनेंट कर्नल स्टीनबैक जो महाराजा रणजीत सिंह जी की फ़ौज में अफसर थे उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह जी के अंतिम संस्कार को अपनी आँखों से देखा था और पूरे घटनाक्रम को अपनी किताब में दर्ज किया था। उनकी पुस्तक The Punjab, Being a Brief Account of the Country of the Sikhs, जो सन 1946 में छपी थी वहां से इस घटना के बारे में पता चलता है।

जैसे ही महाराजा रणजीत सिंह जी की मृत्यु की आधिकारिक घोषणा की गयी और उनके साथ सती होने वाली चार रानियों और सात दासियों की खबर बाहर निकली तो समूचे सिख जगत के सरदार लाहौर में महाराजा और सतियों के सम्मान में आ पहुंचे।

रानियाँ और दासियाँ अपनी इच्छा से सती होने जा रही थी और इस प्रक्रिया की तैयारियां बड़ी तेजी के साथ की जाने लगी। रिश्तेदारों और परिवार वालों की तरफ से सती होने वाली रानियों और दासियों को बहुत मनाया गया लेकिन वो टस से मस नही हुई और सभी ने अंत में एक ही बात कही कि दिया हुआ वचन मोड़ा नही जा सकता है।

महाराजा की शव यात्रा जब महल से निकल कर सडक पर आई तो थल सेना की दो दो पंक्तियाँ सडक के दोनों ओर फौजी फार्मेशन बना कर खड़ी थी और शवयात्रा बहुत धीमे धीमे अंत्येष्टि स्थल की ओर बढ़ रही थी पूरा रास्ता बस एक चौथाई मील भर का ही था। महाराजा की मृत देह को सोने के परत चढ़ी और बहुत सजाई हुई गाडी पर रखा गया था जिसे समुंदरी जहाज के आकार में बनाया गया था और मृतदेह को सोने की जरी वाले मखमल के कपड़ों में लपेटा गया था।

महाराजा की अर्थी सडक के दोनों ओर खड़े सैनिकों के कन्धों के उपर से धीरे धीरे गुजर रही थी और अर्थी के पीछे पीछे ग़मगीन और चिरकाल तक विषादपूर्ण भाव मन में जगाए रखनी वाली धुनें बजाते हुए बैंडवादक दस्ता भी चल रहा था।

महाराजा जी चारों रानियाँ और सातों दासियाँ जो मृत देह के साथ सती होने जा रही थी उन्होंने बेहद भव्य आकर्षक और प्रभावशाली वस्त्र पहने हुए थे वे नज़र आयी । हरेक रानी एक कुर्सी पर विराजमान थी जिसे सैनिकों ने अपने कन्धों पर उठाया हुआ था और सातों दासियाँ उनके पीछे पीछे नंगे पैर पैदल ही चल रही थी ।

हरेक रानी के हाथ में एक शीशा था और उसके उपर छत्र किया गया था। इसके बाद महाराजा का उत्तराधिकारी खड़क सिंह नज़र आया जिसके साथ पूरी सिख सरदारी भी मौजूद थी और पीछे पीछे चल रही थी। खड़क सिंह नंगे पैर था और उसने श्वेत वस्त्र धारण किये हुए थे । किसी भी आम आदमी को इस शवयात्रा में आने की इजाजत नही दी गयी थी।

आखिरी समय में सती होने वाली चारों रानियों ने बेहतरीन मानसिक संतुलन और शान्ति का परिचय दिया । अपनी दर्दनाक मौत जो सरपर खडी थी उसके डर से कोसों दूर चारों रानियाँ बेहद उत्साहित नज़र आ रही थी। चिता के नज़दीक पहुँचते ही चारों रानियाँ बड़ी ही तत्परता के साथ पहले से सजाकर रखी गयी चिता पर चढ़ गयी।

सातों दासियों के चेहरे पर भी कोई खौफ या शिकन नही थी लेकिन उनमें रानियों जितना उत्साह नही था, महाराजा के मृतशरीर को चिता पर रखा गया और उनकी चारों रानियाँ उनकी मृतदेह के चारों और बैठ गयी और उनके पीछे दासियाँ भी बैठ गयी सभी ने अपने हाथ जोड़े हुए थे और आँखें बंद थी । सभी के बैठते ही परिवार वालों और रिश्तेदारों और सिख सरदारों के द्वारा लायी गयी महंगी कश्मीरी शालों से चिता को ढक दिया गया।

महाराजा के उत्तराधिकारी खड़क सिंह ने चिता को अग्नि दी और एक बड़ा कालीन जिसे ज्वलनशील पदार्थं और सुगन्धित तेलों से भिगोया था उसे चिता के उपर डाल दिया गया। दृश्य बेहद डरावना हो गया था जिसे बैंड वादकों ने तेज तेज डरावनी धुनें बजा कर चिता के अंदर से आ रही चीखों को दबा दिया।

डॉ होनीबर्गर जो महाराजा रणजीत सिंह जी के फिजिशियन थे अपनी पुस्तक Thirty-five Years in the East में इस घटनाकर्म का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि “Perhaps our hearts throbbed more at the view of the dismal train, than those of the poor victims themselves.” 

इस पूरे घटनाक्रम पर उस दौर में कांगड़ा शैली में एक पेंटिंग बनाई गयी जिसमें महाराजा की मृत देह के साथ चार रानियों और सात दसियों को सती होते हुए दर्शाया गया है यह पेंटिंग आज भी ब्रिटिश म्यूजियम लन्दन में विद्यमान है जिसे ऑनलाइन देखने लिए इस लिंक पर जाया जा सकता है।

महाराजा रणजीत सिंह का पिंड दान

महाराजा रणजीत सिंह जी के अंतिम संकार के बाद उनके वंशज कुरुक्षेत्र के नज़दीक पेहोवा में उनका पिंडदान आदि क्रियाकर्म आदि करवाने आये और उस समय एक रसीद बनाई गयी जैसा की सभी हिन्दू तीर्थों पर रिकार्ड रखने का रिवाज है।

यह रसीद आज भी अपने मूल रूप में पेहोवा तीर्थ पर श्री विनोद कुमार पंचोली जी के कार्यालय में सुरक्षित है और मुझे इसके साक्षात दर्शन करने का अवसर प्राप्त हुआ है।

सती प्रथा सिख गुरुओं का मत

श्री गुरुनानक देव जी महाराज अपनी बाणी में महिलाओं की पुरुषों के साथ समानता के बारे में अपने भाव व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ” पुरुष स्त्री से पैदा होता है, स्त्री के अंदर, पुरुष का जन्म होता है, स्त्री के साथ ही उसका विवाह होता है, स्त्री के गुजर जाने पर वो स्त्री ही ढूंढता है,जिससे वो बंध जाता है फिर वो स्त्री को बुरा क्यों कहता है स्त्री के गर्भ से ही राजा पैदा होते हैं स्त्री से ही स्त्री पैदा होती है और स्त्री के बिना किसी का कोई अस्तित्व ही नही है” (श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी पृष्ठ संख्या 473)

श्री गुरु अमरदास जी महाराज अपनी बाणी में पुरुषों के संग स्त्री के सती होने के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि ” जो अपने मृत पति के साथ जीवित जल जाती हैं उन्हें सती नही कहा जा सकता है। उन्हें सती सिर्फ तभी कहा जा सकता है जब वे अपने विछोड़े के दर्द को सहन करें । उन्हें तब भी सती कहा जा सकता है जब वे अपने चरित्र का प्रदर्शन करते हुए आत्मिक शांति के साथ अपने पति को श्रद्दा के साथ याद करते हुए जीवन व्यतीत करें।” (श्री गुरु ग्रन्थ साहिब जी पृष्ठ संख्या 787)

सिखों ने हमेशा सती प्रथा को ख़ारिज किया

यह बात सुन कर ही बहुत अजीब लगती हैं कि खालसा राज का प्रतीक माने जाने वाले महाराजा रणजीत सिंह जी की मृत्यु पर चार रानियाँ और सात दासियाँ सती हो गयी और वो भी समस्त सिख सरदारों की मौजूदगी में । जबकि गुरुनानक देव महाराज से लेकर सरबन्सदानी दशमेश पिता श्री गुरुगोबिंद सिंह महाराज जी तक महिलाओं को समानता और बड़ी इज्ज़त मान के साथ समाज में घर परिवार में स्थान देने की बात की गयी है।

पूरे सिख जगत में न पहले और न बाद में ऐसा कोई रेफ़रन्स मिलता है जिसमें किसी सिख सरदार या राजा की मृत्यु पर रानी को सती होना पड़ा हो । लेकिन जब महाराजा की मृत्यु के बाद चार रानियों और सात दासियों ने सती होने की इच्छा जाहिर की और परिवार वालों रिश्तेदारों ने बहुत समझाया तो दिया हुआ वचन तोड़ा नही जा सकता है यह कह कर सती होने वाली रानियों और दासियों ने सभी को चुप करा दिया गया। इससे इस बात का आभास होता है कि महाराजा रणजीत सिंह जी के जीवन काल में रानियों और दासियों की उनसे कोई ना कोई चर्चा इस विषय पर हुई होगी जिसका हवाला देकर सभी सती होने वाली रानियों और दासियों ने परिवार वालों और रिश्तेदारों को चुप करा दिया।

इस घटनाक्रम की आज के दौर में प्रासंगिकता

इतिहास की चाल बहुत धीमे होती है और हर कोई इतिहास का अध्यन नही कर पाता है । राजीनीतिक लोग अपने उल्लू सीधे करने के लिए जनता में दोफाड़ करने का प्रयास झूठी सच्ची कहानियां सूना सुना कर करते ही रहते हैं इसमें कोई नई बात नही है ।

सिख का अर्थ शिष्य होता है और जो लोग गुरुनानक देव जी की विचार धारा से जुड़े और हिन्दू धर्म को कुरीतियों से बचाने के लिए जतन करने लगे सभी सिख कहलाये। आगे चलकर जब सच्चाई से समाज में सुधार होने लगा तो मुग़ल शासन से टाकरा हो गया और फिर बलिदानों की लम्बी दास्ताने इतिहास का हिस्सा बनी और जिसकी परिणति 13 अप्रैल 1699 को खालसा पंथ की सृजना से हुई और खालसा ने धर्म की रक्षा हेतु आर्म्ड स्ट्रगल को आगे बढ़ाया।

अंग्रेजों ने डिवाइड एंड रूल की नीति पर आगे चलते हुए सिखों और हिन्दुओं में दरार डालनी शुरू की और सिखों ने खुद को धर्म के रूप में अपनी पहचान हासिल कर ली फिर राजनीतिक सरगर्मियों और गतिविधियों के चलते ऐसी ऐसी बातें कही जाने लगी जिससे दोनों समाज अपने आप को एक दूसरे से दूर महसूस करने लगे।

लेकिन इतिहास में बुराइयां भी अपना स्थान रखती हैं और महाराजा रणजीत सिंह के साथ उनकी चार रानियों और सात दासियों का सती होना यह बताता है कि उस दौर में हिन्दू सिख आपस में कितने नज़दीक थे। आज कोई कुछ भी कहे लेकिन हमारा इतिहास भूगोल एक ही है।

महाराजा रणजीत सिंह जी के अंतिम संस्कार का यह घटनाक्रम डिवाइड एंड रूल के तहत हिन्दू और सिखों के मध्य खोदी गयी वैचारिक खाई को भरने के काम कर सकती है, क्यूंकि इससे यह पता चलता है कि किसी भी समाज में सुधार की दर बेहद धीमे होती है और समय लगता है समाज की परम्पराएं और मान्यताएं बदलने में। हिन्दू और सिख भाईचारे की मुझे बहुत ज्यादा जरूरत महसूस होती है, क्यूंकि इसी में पूरे देश का हित निहित है।

#भूल_चूक_माफ़_हो