भव रोगों से मुक्ति का उपाय

आत्मनिरीक्षण करना

अर्ताथ अर्जित विवेक के प्रकाश में अपने दोषों को देखना, मोटी बात यह है कि हमें अपनी कमियों का ठीक ठाक अंदाजा होता है। हमें अच्छे से पता होता है कि हम कहाँ गडबड कर बैठते हैं। यदि हम बस आत्मनिरीक्षण करना सीख जाएँ और बस अपने आप से बातें करने लग जाएँ तो हम अपनी कमियों को दूर करने की ओर आपने आप अग्रसर होने लगते हैं। यह काम बिलकुल भी मुश्किल नही है बीएस शुरू करने की देरी भर है। सिर्फ यह करके हम आने वाली अनेक समस्याओं को टाल सकते हैं और बेशुमार मानसिक शान्ति आर्जित कर सकते हैं।

की हुई भूल को दोबारा ना दोहराने का व्रत्त

इस दुनिया में भूल किस से नही होती है भला? लेकिन हम अपनी भूलों को जस्टिफाई करने में अपना समय और कीमती जीवन नष्ट करते रहते हैं और अपने मन में द्वन्द पालते रहते हैं। जिससे मानसिक ऊर्जा लगातार खर्च होती रहती है और हम जाने अनजाने आपनी आदतों के वश वही गलतियां बार बार दोहराते रहते हैं। यदि हम अपने इष्ट के सामने समर्पित भाव से अपनी गलती को माने तो परमात्मा हमारे मन में नैतिक बल उत्पन्न कर देता है और हम समस्या से धीरे धीरे बाहर निकल आते हैं।

प्रयोग करने की तमीज और तरीका

विचार का प्रयोग अपने उपर और विश्वास का प्रयोग हमें दूसरों के उपर करना चाहिए। सरल शब्दों में समझें तो हरेक नया विचार दूसरों पर लागू करने से पूर्व हमें विचार को अपने ऊपर लागू करके उसके परिणाम को समझने का जतन करना चाहिए। यदि हम यह कर लेंगे तो हमारा नजरिया अपने सहयोगियों और मातहतों के प्रतिबदल जाएगा और हम ज्यादा अच्छे से उनके साथ कनेक्ट हो सकेंगे। इसी तरह जब विश्वास करने का अवसर आये तो हमें दूसरों पर विश्वास करना चाहिए और अपने अनुभव के साथ साथ विश्वास के पात्र की खोज और समझ अपने आप आ ही जाती है।

जब न्याय करने का अवसर आये तो पहले अपने उपर उस स्थिति को सोच कर फैंसला करना चाहिए कि यदि मैं इस स्थिति में होता तो कैसे निर्णय लेता। ऐसा करने से हमें न्याय करने में मदद मिलती है और हमारी विश्वसनीयता बढती है।

प्रेम और क्षमा का प्रयोग हमें सैदेव दूसरों पर करना चाहिये। एक बार दंड देने में बस एक बार आनंद लिया जा सकता है लेकिन एक बार क्षमा करने पर जीवन भर उसका आनंद उठाया जा सकता है।

अपना निर्माण करना

जितेन्द्रियता

अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करना है तो मुश्किल कार्य लेकिन हमें जीवन भर इसका अभ्यास करते रहना चाहिए क्यूंकि समय के साथ अभ्यास होने से हम जितना करपाते हैं उतना हमें लाभ मिलना शुरू हो जता है। जो हमारी मदद जीवन भर करता रहता है।

सेवा

सेवा एक अल्टीमेट टूल है जीवन में उपर उठने का। सेवा भाव को मन में लाने से ही सकारात्मक नतीजे मिलने शुरू हो जाते हैं। यथाशक्ति सेवा करने से मन में सात्विक ऊर्जा और संतुष्टि का प्रसार होता है जो नैतिक बल उत्पन्न करता है। जीव मात्र , प्राणी मात्र , पशु पक्षियों की सेवा , वृद्ध और अशक्त जनों की सेवा, गुरुजनों की सेवा ऐसे अनेक अवसर हमारे सामने हरदम मौजूद रहते हैं जिनका हम लाभ उठा सकते हैं और अपनी आत्मिक तरक्की पा कर अपने जीवन का निर्माण कर सकते हैं।

भगवचिंतन

भगवान को मान लेना चाहिए जैसे हमने माना मूलधन 100 मान कर हमें मैट्रिक पास की हुई है और हायर स्टडीज में हम X की वैल्यू 100 मान कर मुश्किल प्रश्नों को हल करते आये हैं। ठीक उसी तरह जीवन के सभी कठिन प्रशन भगवान का अस्तित्व मान कर हम उससे काल्पनिक संवाद करके हल कर सकते हैं। क्योंकि जो मानने लग गया उसके सवाल हल होने शुरू हो जाते हैं और जो नहीं मानते सवाल तो उनके भी हल हो ही जाते हैं लेकिन कैसे होते हैं बस उन्ही का जी जानता है।

खोज

खोज यानी मन में क्युरोसिटी के कीडे, ये जीवन में बहुत जरूरी होते हैं। इनके होने से मन में तरह तरह के सवाल उमड़ते घुमड़ते रहते हैं जिनकी तलाश में हमें गुरुजनों और गुणीजनों के पास जाना पड़ता है और सत्संग लाभ लेना पड़ता जिससे हमें अनेक तरह की प्राप्तियां हो जाती हैं। खोज एक अनवरत प्रक्रिया है जो सक्रिय दिमाग में सैदेव जारी रहती है।

रवैया

दूसरों के कर्तव्य को अपना अधिकार ना मानना

हम अक्सर अपने अधिकारों के प्रति बेहद जागरूक और संजीदा होते हैं। हमारा आधुनिक कहे जाने वाला मोड्रेंन एजुकेशन सिस्टम हमें अपने अधिकारों के प्रति बहुत जागरूक करता है। यदि हमें जरा सा भी एहसास हो जाए कि सामने वाले का कर्तव्य हमारे अधिकार की पूर्ती के लिये हैं तो हम बेहद डिमांडिंग बन जाते हैं और हमारे व्यवाहर में आतुरता आ जाती है जो जीवन में हल्कापन लेकर आती है।