दूबघास दूर्वा दरोब Cynodon_dactylon एक चमत्कारी औषधि

नंद किशोर प्रजापति कानवन

चार दिन पहले कुशग्रहणी अमावस्या थी तब हमनें कुश/डाब की चर्चा की थी ,उसके गुणों ओर धार्मिक महत्व को जाना था। आज गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की प्रिय दरोब/दूर्वा का दिन हैं। आज की परिचर्चा में हम दरोब के गुणों को जानने का प्रयास करेंगे।

दूर्वे अमृत संपन्ने शत मूले शतांकुरे!
शतंम् हरती पापानी शतंम् आयुष्य वर्धिनी!!

हे दूर्वा तुम अमृत संपन्न हो.. पाप और रोगो का निवारण करने वाली हो .शत मूल व शतांकुर वाली दुर्वा आपको प्रणाम

दूर्वा के अनेक नाम हैं मालवांचल में इसे दरोब नाम से जाना जाता हैं।साथ इसे दूब, अमृता,अनंता, गौरी,महौषधि,शतपर्वा,भार्गवी आदि नामों से भी जाना जाता हैं।

सभी जगह आसानी से मिल जाने वाली यह घाँस ज़मीन पर पसरते हुए चलती हैं।हमारे देश मे सैंकड़ों प्रकार की घाँस हैं जिनमे सबसे श्रेष्ठ दूर्वा को ही माना गया हैं। इसका उल्लेख आयुर्वेद ही नही हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता हैं जो इसके गुणकारी पक्ष को बताता हैं।हमारे वार-त्योहार, संस्कार एवं कर्मकाण्डों में इसका उपयोग सदैव से होता आया हैं।

भगवान गणेश की अतिप्रिय दूर्वा से जुड़ी कथा हैं कि समुंद्र मंथन में निकले अमृत को सर्वप्रथम जिस जगह पर रखा था वहाँ दूर्वा घाँस थी इसी कारण इसे अमृता कहा हैं, वही भगवान गणेश ने किसी राक्षस को निगल लिया तब गणेश जी को दूर्वा की 21 गांठे पिलाई ,जिससे उनके पेट की अग्नि शांत हुई ,इसी कारण भगवान गणेश को 21 गांठे दरोब की चढ़ाई जाती हैं।

अन्य मौसम की अपेक्षा वर्षा काल के दौरान दूब घास अधिक वृद्धि करती है तथा वर्ष में दो बार सितम्बर-अक्टूबर और फ़रवरी-मार्च में इसमें फूल आते हैं। दूब का पौधा एक बार जहाँ जम जाता है।वहाँ से इसे नष्ट करना बड़ा मुश्किल होता है। इसकी जड़ें बहुत ही गहरी पनपती है। दूब की जड़ों में हवा तथा भूमि से नमी खींचने की क्षमता बहुत अधिक होती है, यही कारण है कि चाहे जितनी सर्दी पड़ती रहे या जेठ की तपती दुपहरी हो, इन सबका दूब पर असर नहीं होता और यह अक्षुण्ण बनी रहती है।
प्रायः जो वस्तु स्वास्थ्य के लिए हितकर सिद्ध होती थी, उसे हमारे ऋषि-मुनियों ओर पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसका महत्व और भी बढ़ा दिया।

हमारे शास्त्रों के साथ ही अनेक विद्वानों ने इसके अनेक गुणों का परीक्षण कर इसे एक अति गुणकारी महाओषधि माना हैं।दूब में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।दूब के पौधे की जड़ें, तना, पत्तियाँ इन सभी का चिकित्सा क्षेत्र में भी अपना विशिष्ट महत्व है। आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार दूब का स्वाद कसैला-मीठा होता है।विभिन्न पैत्तिक एवं कफज विकारों के शमन में दूब का निरापद प्रयोग किया जाता है।

दूब को पीसकर फटी हुई बिवाइयों पर इसका लेप करके लाभ प्राप्त करते है।
इस पर सुबह के समय नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढती है और अनेक विकार शांत हो जाते है।
दूब घास शीतल और पित्त को शांत करने वाली है।
दूब घास के रस को हरा रक्त कहा जाता है, इसे पीने से एनीमिया ठीक हो जाता है।
नकसीर में इसका रस नाक में डालने से लाभ होता है।
इस घास के काढ़े से कुल्ला करने से मुँह के छाले मिट जाते है।
दूब का रस पीने से पित्त जन्य वमन ठीक हो जाता है।
इस घास से प्राप्त रस दस्त में लाभकारी है।
यह रक्त स्त्राव, गर्भपात को रोकती है और गर्भाशय और गर्भ को शक्ति प्रदान करती है।
दूब को पीस कर दही में मिलाकर लेने से बवासीर में लाभ होता है।
इसके रस को तेल में पका कर लगाने से दाद, खुजली मिट जाती है।
दूब के रस में अतीस के चूर्ण को मिलाकर दिन में दो-तीन बार चटाने से मलेरिया में लाभ होता है….।
इसके रस में बारीक पिसा नाग केशर और छोटी इलायची मिलाकर सूर्योदय के पहले छोटे बच्चों को नस्य दिलाने से वे तंदुरुस्त होते है।

हमारे आदरणीय मित्र श्री दीपक आचार्य जी के अनुसार
आज संडे की सुबह क्रिकेट खेलकर हड्डियों की खूब घिसाई किये और जब घर लौट रहे थे तो मैदान के एक छोर से उठा ले आए दूब घास। दूब घास का महत्व जितना पुराणों और हमारी हिंदुस्तानी संस्कृति में देखने आता है, उतना ही महत्व इसका पारंपरिक तौर से तमाम रोगों के उपचार के लिए है। कुत्तों को कभी घास चबाते देखा है? जब उन्हें अपचन हो जाता है या पेट में कोई तकलीफ होती है, वे सबसे पहले दूब घास चबाते हैं और उल्टी कर देते हैं। ये ट्रीटमेंट का उनका अपना तरीका है। क्लिनिकली देखा जाए तो पेट की कई सारी समस्याओं को छू मंतर करने के लिए दूब काफी प्रभावी होती है। आज मैं इससे जुड़ी कुछ और दूसरी जानकारी देने जा रहा हूँ।

मेलघाट (महाराष्ट्र) में तफरी मारते हुए एक दिन एक हर्बल जानकार से मुलाक़ात हुयी। उनकी छोटी सी फार्मेसी में हर्पीस का एक पेशेंट आया हुआ था। इन हर्बल जानकार साहब ने उस पेशेंट से कहा कि चावल के आटे के साथ दूब के रस को मिलाकर उसका पेस्ट तैयार करें और शरीर के उन हिस्सों पर लगाएं जहाँ हर्पिस का ज्यादा प्रभाव है, जब ये पूरी तरह सूख जाए तो इसे साफ कर सकते हैं। हर दिन, इसे कम से कम 3 बार दोहराना होता है। मैंने पेशेंट का फॉलोअप लेना शुरू किया, यकीन मानिये, मैं ये जानकर हैरान था कि सिर्फ 3 दिन में ही उसे बेहद आराम मिल चुका था। और ख़ास बात यह भी कि पहली बार लगाते ही उसके शरीर पर जलन और दर्द में 90% तक आराम मिल चुका था। दूब में ट्रायटरपिनोइड्स, पामिटिक एसिड, कैरोटीन, फ्रीडलीन जैसे रसायन पाए जाते हैं जो एंटीवायरल हैं, ध्यान रहे हर्पिस एक वायरल रोग है 👌

घमौरियों (प्रिकली हीट) को रोकने के लिए #पातालकोट के आदिवासी इसका रस पीठ, गर्दन और पेट पर लगाते हैं। घमौरियों में तुरंत आराम मिलता है। कई हर्बल जानकारों ने तो मुझे कई बार ये भी बताया है कि इसके रस का इस्तेमाल घाव को दुरुस्त करने के लिए भी खूब करते हैं। इन दावों को पुख्ता समझने के लिए कई रिसर्च पेपर्स खंगाल चुका हूँ और हर बार दूब से जुड़ा पारंपरिक ज्ञान ‘हथौड़ा मार’ ही साबित हुआ है, एकदम सटीक, 💯% सटीक।

जब भी कभी खुले मैदान, पार्क, सड़क किनारे या खेत खलिहान तरफ जाएं, दूब दिख जाए #दीपकआचार्य को जरूर याद कर लेना इसी बहाने हिचकी तो आएगी मुझे

एक बात और, गणपतिजी को बेहद पसंद है दूब या दूर्वा दूर्वा यानी तमाम समस्याओं को दूर करने वाली। कितना कुछ सीखना बाकी है, कितना कुछ है हमारे आसपास ही, बस भटको तो सब मिलेगा। मैं तो भटका हुआ ही हूँ, भगवान करे कभी मंज़िल ना मिले, भटकने का मज़ा जो खत्म हो जाएगा