रेज़ांग ला में लड़ने वाली चार्ली कंपनी का हर जवान हीरो था

राजीव पुरोहित

बात फ़रवरी 1963 की है. चीन से लड़ाई ख़त्म होने के तीन महीने बाद एक लद्दाखी गड़ेरिया भटकता हुआ चुशूल से रेज़ांग ला जा पहुंचा। एकदम से उसकी निगाह तबाह हुए बंकरों और इस्तेमाल की गई गोलियों के खोलों पर पड़ी. वो और पास गया तो उसने देखा कि वहाँ चारों तरफ़ लाशें ही लाशें पड़ी थी वर्दी वाले सैनिकों की लाशें।


“किसी की राइफ़ल टूट कर उड़ चुकी थी, लेकिन उसका बट उसके हाथों में ही था। हुआ ये था कि लड़ाई ख़त्म होने के बाद वहाँ भारी हिमपात हो गया और उस इलाके को ‘नो मैन्स लैंड’ घोषित कर दिया गया, इसलिए वहाँ कोई जा नहीं पाया।


“लोगों को इनके बारे में पता ही नहीं था कि इन 113 लोगों के साथ हुआ क्या था। लोगों को यहाँ तक अंदेशा था कि वो युद्धबंदी बन गए हैं। तब तक इनके नाम के आगे एक तरह का बट्टा लग गया था। उनको कायर क़रार कर दिया गया था। उनके बारे में मशहूर हो गया था कि वो डर कर लड़ाई से भाग गए थे।”


“दो तीन लोग जो बच कर आए उनका लोगों ने हुक्का-पानी बंद कर दिया था। यहाँ तक कि उनके बच्चों को स्कूलों से निकाल दिया गया। एक एनजीओ को बहुत बड़ा अभियान चलाना पड़ा कि वास्तव में ये लोग हीरो थे, कायर नहीं थे।”


1962 में 13 कुमाऊँ को चुशूल हवाईपट्टी की रक्षा के लिए भेजा गया था। उसके अधिकतर जवान हरियाणा से थे जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में कभी बर्फ़ गिरते देखी ही नहीं थी। उन्हें ऊँचाई और सर्दी में ढ़लने का मौका ही नहीं मिल पाया था। उनके पास शून्य से कई डिग्री कम तापमान की सर्दी के लिए न तो ढ़ंग के कपड़े थे और न जूते।

उन्हें पहनने के लिए जर्सियाँ, सूती पतलूनें और हल्के कोट दिए गए थे। मेजर शैतान सिंह ने अपने जवानों को पहाड़ी के सामने की ढलान पर तैनात कर दिया था। 18 नवंबर, 1962 को रविवार का दिन था। ठंड रोज़ की बनिस्बत कुछ ज़्यादा पड़ रही थी और रेज़ांग ला में बर्फ़ भी गिर रही थी।


“तड़के साढ़े तीन बजे अचानक एक लंबा बर्स्ट आया ड-ड-ड-ड-ड. पूरा पहाड़ी इलाका उसके शोर से गूंज गया. मैंने मेजर शैतान सिंह को बताया कि 8 प्लाटून के सामने से फ़ायर आया है. चार मिनट बाद हरि राम का फ़ोन आया कि 8-10 चीनी सिपाही हमारी तरफ़ बढ़ रहे थे ” मेजर शैतान सिंह ने आदेश दिया कि जैसे ही चीनी उन की फ़ायरिंग रेंज में आएं, उन पर फ़ायरिंग शुरू कर दी जाए।


“जब चीनी 300 गज़ की रेंज में आए तो उन पर फ़ायर खोल दिया। क़रीब 10 मिनट तक भारी फ़ायरिंग होती रही। मेजर शैतान सिंह बार बार बाहर निकल जाते थे। मैं उन्हें आगाह कर रहा था कि बाहर मत जाइए क्योंकि कोई भरोसा नहीं कि चीनियों की कब ‘शेलिंग’ आ जाए।” “पहला हमला उन्होंने नाकामयाब कर दिया था। ढलान के इधर-उधर चीनियों की लाशें पड़ी हुई थीं जो उन्हें ऊपर से दिखाई दे रही थीं। लेकिन फिर चीनियों ने मोर्टर फ़ायरिंग शुरू कर दी। ये हमला 15 मिनट तक चला होगा।”

इस बीच मेजर शैतान सिंह की बाँह में ‘शेल’ का एक टुकड़ा आ कर लगा। उन्होंने पट्टी करवा कर अपने सैनिकों का नेतृत्व करना जारी रखा। वो ‘रिज’ पर थे तभी उनके पेट पर एक पूरा ‘बर्स्ट’ लगा। हरफूल ने लाइट मशीन गन से चीन के उस सैनिक पर फ़ायर किया जिसने शैतान सिंह पर गोली चलाई थी।
हरफूल को भी गोली लगी और उन्होंने गिरते हुए रामचंद्र से कहा कि मेजर साब को दुश्मन के हाथों मत लगने देना। मेजर शैतान सिंह अत्यधिक ख़ून बह जाने के कारण बार बार बेहोशी की हालत में चले जा रहे थे।

“मेजर साब ने मुझसे कहा रामचंद्र मेरे पेट में बहुत दर्द हो रहा है। मेरी बेल्ट खोल दो. मैंने उनकी कमीज़ में हाथ डाला। उनकी सारी आंतें बाहर आ गई थीं। मैंने उनकी बेल्ट नहीं खोली, क्योंकि अगर मैं ऐसा करता तो सब कुछ बाहर आ जाता। इस बीच लगातार फ़ायरिंग हो रही थी. बेहोश हो गए मेजर शैतान सिंह को फिर होश आया।”

यादव कहते हैं, “उन्होंने टूटती सांसों से कहा मेरा एक कहना मान लो. तुम बटालियन में चले जाओ और सब को बताओ कि कंपनी इस तरह लड़ी है. मैं यहीं मरना चाहता हूँ। ठीक सवा आठ बजे मेजर साब के प्राण निकले।”

चारों तरफ़ लाशें ऐसे बिखरी पड़ी थीं जैसे वो कपड़े की गुडियाएं हों. मेजर शैतान सिंह का टेंट बुरी तरह से तहसनहस हो चुका था. उनके दोस्त चिमन का सिर धड़ से अलग पड़ा था। यादव ने बताया, “मैं मामूली ज़ख़्मी था और पूरी तरह से होश में था। लेकिन मेरे दिमाग़ में हरफूल की वो बात दौड़ रही थी कि मेजर साब की लाश चीनियों के हाथ नहीं पड़नी चाहिए। मैंने उनको ज़ोर से अपनी बाहों में लिया और उनके साथ एक खड्ड में लुढ़क गया। फिर मैं उन्हें अपनी पीठ पर लाद कर क़रीब 800 मीटर तक चला। फिर एक बड़े पत्थर के पास मैंने मेजर शैतान सिंह को लिटा दिया। ठीक सवा आठ बजे मेजर साब के प्राण निकले।”

मेजर शैतान सिंह का जन्म 1 दिसंबर, 1924 को जोधपुर ज़िले के बनासर गाँव में हुआ था। उनका नाम भले ही शैतान सिंह हो, वो भारतीय सेना के सबसे नेक इंसानों में से एक थे। “मेजर शैतान सिंह भी एक फ़ौजी परिवार से थे। उनके पिता एक सैनिक अधिकारी थे। उन्हें ओबीई मिला हुआ था वो बहुत शरीफ़ आदमी थे। आमतौर से योद्धाओं की छवि होती है कि वो बहुत ख़ूंखार होते हैं। लेकिन उनके साथ ऐसा कुछ नहीं था।”


रेज़ांग ला की लड़ाई को भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाइयों में से एक माना जाता है, जब एक इलाके का रक्षण करते हुए लगभग सभी जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। 114 जवान वहाँ मारे गए. पांच को युद्धबंदी बना लिया गया उनमें से एक की मौत हिरासत में हुई। ये लड़ाई सुबह साढ़े तीन बजे शुरू हुई थी और सवा आठ बजे ख़त्म हो गई थी पर मुख्य लड़ाई आख़िरी घंटे में ही हुई थी।”

रेज़ांग ला में लड़ने वाली सी कंपनी का हर जवान हीरो था। अदम्य साहस दिखाने के लिए मेजर शैतान सिंह को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
लड़ाई ख़त्म होने के तीन महीने बाद मेजर शैतान सिंह के पार्थिव शरीर को जोधपुर में राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया. बाकी सैनिकों की सामूहिक चिताएं, रेज़ांग ला में बटालियन हेडक्वार्टर के सामने जलाई

सूबेदार राम चंद्र यादव इस मुश्किल समय में उनके साथ थे और उन चंद लोगों में से एक हैं जिन्होंने उन्हें ज़िंदा देखा था