मानस प्रभाती

डॉ अरविंद मिश्रा

चित्रकूट पहुँचने के पहले श्रीराम ने मुनिवर वाल्मीकि से किसी निरापद स्थल के बारे में पूछा जहाँ वे सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास का कुछ समय बिता सकें। मुनि वाल्मीकि उन्हें कुछ स्थलों की जानकारी दी और आप भी उन स्थलों के बारे में जानिए।

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ

  • जो सब कर्मों का एक मात्र यही फल माँगते हैं कि श्री रामचन्द्रजी के चरणों में हमारी प्रीति हो, उन लोगों के मन रूपी मंदिरों में सीताजी और रघुकुल को आनंदित करने वाले आप दोनों बसिए।
  • काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा॥
    जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया॥

जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह हैं, न लोभ है, न क्षोभ है, न राग है, न द्वेष है और न कपट, दम्भ और माया ही है- हे रघुराज! आप उनके हृदय में निवास कीजिए।

  • सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥
    कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत सरन तुम्हारी॥

जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा (बड़ाई) और गाली (निंदा) समान है, जो विचारकर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते-सोते आपकी ही शरण हैं।

  • तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं॥
    जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी॥

और आपको छोड़कर जिनके दूसरे कोई गति (आश्रय) नहीं है, हे रामजी! आप उनके मन में बसिए। जो पराई स्त्री को जन्म देने वाली माता के समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है।

  • जे हरषहिं पर संपति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी॥
    जिन्हहि राम तुम्ह प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे॥

जो दूसरे की सम्पत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष रूप से दुःखी होते हैं और हे रामजी! जिन्हें आप प्राणों के समान प्यारे हैं, उनके मन आपके रहने योग्य शुभ भवन हैं.

  • स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात।
    मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात॥

हे तात! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं, उनके मन रूपी मंदिर में सीता सहित आप दोनों भाई निवास कीजिए॥