आप मैं हम और देश की आर्थिकी

देश मे एक संविधान है और हज़ारों कानून हैं जो यह सोच कर और मान कर घड़े लिखे गए हैं कि अथॉरिटीज तो देवता हैं और आम जनता चोर है डाकू है। ऑथोरिटी कदे भी गलत काम नही करती और कर सकती।

देश ने एक कम्पनी बनती है जो बनते ही इनकम टैक्स कानून, GST कानून और कंपनीज एक्ट के तहत देश के संविधान के दायरे में काम करने लगती है।

कम्पनी के लिए सरकार ने एक Statutary ऑडिटर का प्रावधान किया हुआ है जिसे कम्पनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स लगा तो अपनी मर्जी से सकते हैं लेकिन हटा नही सकते। वो सांड अपनी मर्जी से ही चरता है और अपनी मर्जी से ही हट सकता है। उसे यदि जबरदस्ती लठ मार के हटाना हो तो पूरा केस फ़ाइल करने जैसा काम करना पड़ता है और मुकदमा तक लड़ना पड़ सकता है। सरकार ने ऐसा प्रवधान केवल और केवल गदर न माचे इसीलिये बनवा रखा है।

ऑडिटर एक इंडिपेंडेंट अथॉरिटी है, जिसे सबसे पहले पता चलता है के कम्पनी में गन्द मचा हुआ है। वो इस गन्द को ढकने के लिए मोटा माल लेता है और ऑडिट रिपोर्ट में एक लाइन लिख कर छूट जाता है के जैसा रिकार्ड मुझे दिखाया गया उसी के आधार पर मैंने ऑडिट कर दिया है। मतलब भूलचूक लेनी देनी।

ऑडिटर की हस्ताक्षर की हुई ऑडिटेड बैलेंस शीट के आधार पर इनकम टैक्स रिटर्न्स तैयार होती हैं और वो समय से फ़ाइल की जाती हैं। जहां कम्पनी का दफ्तर होता है वो किसी न किसी इनकम टैक्स वार्ड की सीमा में आता है। भारत देश मे 1 मिलीमीटर भूमि भी ऐसी उपलब्ध नही है जो किसी न किसी इनकम टैक्स वार्ड में न आती हो। इस वार्ड का एक वार्डन यानि इनकम टैक्स ऑफिसर भी होता है जो अपनी अक्ल और टेबल पर पड़े दस्तावेजों का मिलान करके सरकार को रिपोर्ट भेजता है के सब ठीक चल रहा है। यह काम उसे साल दर साल करना होता है। उसके घर और दफ्तर में दोनो जगह अखबार आते हैं उसे सब पता चलता रहता है के उसके वार्ड में चल क्या रहा है।

वो चुप रहने के लिये बार बार गांधी दर्शन करने का आदि होता है। वो सिर्फ गुलाबी गांधी जी से मिलने पर ही प्रसन्न होता है।

उसके बाद RoC यानि रजिस्ट्रार ऑफ कम्पनीज में हर वर्ष सभी कागज़ात फ़ाइल किये जाते हैं जिसमे ऑडिटेड बैलेंस शीट और पचास तरह के अन्य कागजात जो कम्पनी के रेगुलेशन से जुड़े हुए होते हैं। मौजूदा कम्पनी प्रावधानों को देख लें तो वो ऐसे बने हुए हैं के परिंदा भी पर नही मार सकता। मतलब यह है के कम्पनी unsecured लोन तक अनजान लोगो से नही ले सकती। बिना ब्याज का कोई लोन देना चाहे तो भी कम्पनी नही ले सकती।

कम्पनी की जितनी ऑथोरिजेड कैपिटल है उससे 1 रुपया अधिक नही एकत्र कर सकती। कंपनी SEBI से अप्रूवल लिये बिना 1 रुपया इन्वेस्ट नही करवा सकती। किसी को लोन नही दे सकती। कैश में पेमेंट नही कर सकती। कैश ले नही सकती।बैंक खाते छिपा नही सकती। लेकिन गांधी जी का प्रभाव इतना जोरदार है के सब गोलमाल है। सीधे रास्ते की टेढ़ी चाल है।

इन सबसे अलग देश मे स्टेट और सेंटर की इंटेलिजेंस एजेंसियां हैं जिनकी यह ड्यूटी है के बाजार से अखबार से इश्तेहार से जो भी जरूरी वाजिब सूचनाएं मिलें उन्हें हर रोज ऊपर बताया जाए। लेकिन इनके पास भी सिर्फ राजनीतिक पोर्टफोलियो ही है काम करने को। ये सारा दिन राजनीतिक जासूसी करके ऊपर बताते रहते हैं और कोई खास काम नही। जबकि इनकी एक रिपोर्ट से इकनोमिक ऑफेंस विंग एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट वाले सब कुम्भकर्णी नींद से जाग कर कोई कारवाई कर सकते हैं। लेकिन नही।

हर रोज बंगाली तांत्रिक वाले कम से कम तीन सौ विज्ञापन हर रोज छपते हैं अखबारों में जिनमे मनचाहा प्यार, सौतन से छुटकारा, व्यापार में लाभ, फंसे हुए पैसे, गड़ा हुआ धन निकलवाने के आफर होते हैं। SHO ये अखबार नही पढ़ता क्या क्यों नही लयाते गेर के बोरी में बंद करके। कदे भी नही भाई दुधारू गाय है वो इनकी।

इस कांड के लिए सबसे पहले जिम्मेवार तो वो लालची लोग जो इसमें बड़े।

दूसरे बड़े जिम्मेवार Statutary ऑडिटर और कंपनी सेक्रेटरी।

सबसे बड़ा जिम्मेवार इंकॉमेटैक्स वार्ड का वार्डन।

जब तक अथॉरिटीज liable नही बनाई जाएंगी और इनके फांसी नही तोड़ी जाएगी तब तक ये गंदे खेल ऐसे ही चलते रहेंगे।