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जेमिमा रोड्रिग्स : हाकी से क्रिकेट की पिच तक पहुंचने की प्रेरक कहानी

Focused keyword: जेमिमा रोड्रिग्स
Meta description: जेमिमा रोड्रिग्स की प्रेरक यात्रा और सफलता की कहानी, जिन्होंने हाकी छोड़कर क्रिकेट चुना और वर्ल्ड कप में भारत को फाइनल में पहुंचाया। Read more
Tags: जेमिमा रोड्रिग्स,भारतीय महिला क्रिकेट,महिला खेल,वनडे वर्ल्ड कप,मुंबई क्रिकेट,एमआईजी क्लब,हाकी और क्रिकेट,क्रिकेट प्रेरक कहानियां,भारतीय खेल नायिका,महिला सशक्तिकरण
Slug: jemimah-rodrigues-biography
  • जेमिमा रोड्रिग्स बचपन में हाकी और क्रिकेट दोनों खेलों में बेहतरीन प्रदर्शन करती थीं।
  • 11 वर्ष की आयु में उन्हें तय करना पड़ा कि हाकी खेलेंगी या क्रिकेट।
  • सिर्फ तीन साल की उम्र में उन्हें दादाजी ने प्लास्टिक का बैट दिया था, जिससे उनकी क्रिकेट यात्रा शुरू हुई।
  • उनके पहले कोच उनके पिता आइबन रोड्रिग्स थे।
  • बाद में उन्होंने मुंबई के एमआईजी क्लब (MIG Club) में कोच प्रशांत शेट्टी के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लिया।
  • वो शुरुआती दिनों में लड़कों के साथ ही अभ्यास और मैच खेलती थीं।
  • 13 साल की उम्र में उन्हें मुंबई की अंडर-19 टीम में जगह मिल गई।
  • साल 2022 के वनडे वर्ल्ड कप में उन्हें भारतीय टीम से बाहर किया गया था, बाद में शानदार वापसी की।
  • उनके शतक ने भारत को वनडे वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई।

परिचय

भारतीय महिला क्रिकेट के मैदान पर कई नाम चमक चुके हैं, लेकिन कुछ खिलाड़ियों की यात्रा दिल को छू जाती है। जेमिमा रोड्रिग्स का सफर भी ऐसा ही है। बचपन से ही वे कई खेलों में सक्रिय रहीं। फुटबाल, बास्केटबाल, हाकी और क्रिकेट में उनका प्रदर्शन बराबरी का था। लेकिन एक समय ऐसा आया जब उन्हें अपने जीवन का महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ा।

बचपन और शुरुआत

तीन साल की उम्र में जब उनके दादाजी ने उन्हें प्लास्टिक का क्रिकेट बैट दिया, तभी उनके अंदर (Cricket) के लिए एक अलग आकर्षण पैदा होने लगा। उन्हें खिलौनों की जगह बैट और बॉल पसंद आते थे। गली में अपने दो भाइयों के साथ खेलते हुए उन्होंने खेल की बुनियादी समझ हासिल की। उनके पहले कोच उनके पिता ही थे, जो उन्हें और उनके भाइयों को बराबरी से मार्गदर्शन देते थे।

एमआईजी क्लब में प्रवेश और प्रशिक्षण

आगे चलकर वे मुंबई के एमआईजी क्लब में प्रशिक्षित होने लगीं। उस दौर में लड़कियों को क्रिकेट में जगह मिलना मुश्किल था, लेकिन उनके खेल ने सबको प्रभावित किया। कोच प्रशांत शेट्टी ने जब पहली बार जेमिमा को कवर ड्राइव लगाते देखा, तभी समझ गए कि इस बच्ची में खास कौशल है। वहां उन्होंने लड़कों के साथ खेलकर खुद को मजबूत और प्रतिस्पर्धी बनाया।

परिवार और सामाजिक चुनौतियां

परिवार के कुछ रिश्तेदारों ने सवाल उठाए कि एक लड़की क्रिकेट क्यों खेले। लेकिन उनके माता-पिता ने हमेशा उनका साथ दिया। जेमिमा ने खुद कहा है कि उनके माता-पिता और कोच ने कभी उनपर रोक नहीं लगाई, बल्कि हर कदम पर प्रोत्साहित किया।

राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रगति

साल 2012-13 में, मात्र 13 वर्ष की उम्र में, उन्हें मुंबई की अंडर-19 टीम के लिए चुना गया। यह उनकी प्रतिभा की पुष्टि थी। इसके बाद उन्होंने मैदान पर अपनी पहचान और मजबूत की। हालांकि राष्ट्रीय टीम में उनका सफर हमेशा सीधा नहीं रहा।

उतार-चढ़ाव और वापसी

साल 2022 के वनडे वर्ल्ड कप के लिए उन्हें भारतीय टीम से बाहर कर दिया गया था। यह उनके करियर का कठिन चरण था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और खुद पर काम किया। जल्द ही उनकी फिटनेस, लय और प्रदर्शन ने उन्हें वापसी करने में मदद की।

वह यादगार पल

कुछ समय बाद उन्होंने शानदार शतक लगाया, जिसकी बदौलत भारत वनडे वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंचा। यह सिर्फ एक मैच की जीत नहीं थी, बल्कि उनके धैर्य, मेहनत और विश्वास की जीत थी।

निष्कर्ष

जेमिमा रोड्रिग्स की कहानी हमें यह सिखाती है कि निर्णय चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो, मन की आवाज को चुनना हमेशा सही होता है। लगातार प्रयास, परिवार का समर्थन और खुद पर भरोसा किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने की सबसे बड़ी कुंजी है।