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आर्थिक विकास में कृषि की भूमिका

लेखक चौधरी चरण सिंह भूतपूर्व प्रधानमंत्री

भारत एक अल्प विकसित देश है बेहद गरीबी का शिकार। गरीबी का अर्थ है उन चीजों का अभाव जिनसे जिन्दा रहने के लिए मनुष्य की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं चाहे ये चीजें खेतों में पैदा हों या दूसरे क्षेत्रों में तैयार हों। इन सभी चीजों का मूल स्रोत भूमि है। भूमि से ही वह खाद्य पदार्थ उपजते हैं जिनका मनुष्य सेवन करता है और भूमि पर ही वह कच्चा माल पैदा होता है जिससे कृषीतर माल का उत्पादन होता है, और यह माल भी मनुष्य के उपयोग में आता है।

दूसरे शब्दों में, सारी आबादी के लिए खाद्य सामग्री उपलब्ध करने के साथ-साथ कृषि को कपड़ा मिलों, तेल की मिलों, चावल की मिलों, चटकलों, चीनी के कारखानों, वनस्पति की मिलों और तम्बाकू के कारखानों जैसे उपभोक्ता उद्योगों को बराबर चलाते रहने के लिए निरन्तर अधिक-से-अधिक मात्रा में कच्चा माल मुहैया करना होता है और कृषि का अर्थ है भूमि का उपयोग व प्रयोग।

इसी प्रकार जंगलों व पशुओं से जिनका पालन-पोषण भूमि ही करती है मनुष्य को इमारती लकड़ी, गोंद, रेसिन, खालें व हड्डियाँ इत्यादि विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ उपलब्ध होती हैं। इन वस्तुओं से असंख्य उद्योग चलते हैं।

इसके अतिरिक्त खानों व खदानों से, भूमि में से पत्थर, कोयला, तेल, लोहा, अन्य धातु व खनिज पदार्थ निकाले जाते हैं।

दुर्भाग्य से जो भारत लगभग 1925 तक खाद्यान्नों का निवल निर्यातक था, 1943 के बंगाल दुर्भिक्ष के बाद से वह उनका आयात करने लगा है। 1970 तक के बीस वर्षों में खाद्य सामग्री के आयात पर हमें औसतन 207.8 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष खर्च करना पड़ा है। और 1970 के बाद के पाँच वर्षों में अर्थात 1971-76 में इस मद में खर्च बढ़कर 289.2 करोड़ वार्षिक हो गया। इन सभी वर्षों में भारत को दूसरे देशों से गेहूं भेंट के रूप में भी मिला। 1965-67 दौरान 45,76,000 मीट्रिक टन गेहूं भेंट के रूप में मिला। 1975 में केवल कनाडा से 37.8 करोड़ रुपये का 2,50,000 मीट्रिक टन गेहूं भेंट में मिला।

केवल खाद्यान्न ही नहीं, कृषि से प्राप्त होने वाले कच्चे माल का भी आयात करना पड़ा। मिसाल के लिए, कपड़ा भोजन के बाद मनुष्य के लिए सबसे अधिक प्रावश्यक वस्तु है, उसके उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल भी हमें मँगाना पड़ा। 1971-72 तक विश्व मण्डी में लम्बे रेशे की कपास के खरीदारों में भारत की गिनती होती थी।

प्रायद्वीपीय मुख्य विकासोन्मुख कृषि से उत्पन्न अतिरिक्त खाद्य-पदार्थ व कच्चा माल हमें विदेशी मुद्रा कमाने में बहुत मदद दे सकते हैं और इस विदेशी मुद्रा से हम प्रौद्योगिक विकास के लिए पूँजीगत माल का आयात कर सकते हैं ऐसे पूँजीगत माल का जिसकी आवश्यकता हर देश को होती है चाहे उसकी अर्थव्यवस्था कैसी भी हो, भले ही वह गांधी की विचारधारा के अनुकूल हो। कनाडा ने अपने उद्योगों का निर्माण इमारती लकड़ी का निर्यात करके किया था और जापान ने रेशम का निर्यात करके।

सत्तारूढ़ दल ने यद्यपि कृषि की उपेक्षा की, फिर भी 1974-75 तक में हमारे देश से निर्यात हुए मुख्य माल का पूरा दो-तिहाई ऐसा माल था जो कृषि की उपज था कच्ची उपज तथा प्रक्रमणित माल मिलाकर। कृषि में मत्स्य, वन तथा पशुपालन क्षेत्र के उत्पाद शामिल हैं। उस वर्ष हमारे माल का 79 प्रतिशत ऐसा माल था जिसे मुख्य निर्यात कहा जाता है और शेष 21 प्रतिशत ऐसा निर्यात था जिसे छोटा-मोटा समझना चाहिए।

  • इस छोटे-मोटे निर्यात में कृषि व कृषीतर दोनों क्षेत्रों का ही माल था।
  • और 79 प्रतिशत मुख्य निर्यात में से 52 प्रतिशत कृषि का उत्पाद था।
  • 1950-51 में मुख्य निर्यात 77 प्रतिशत में से 75 प्रतिशत कृषि का उत्पाद था और छोटा-मोटा निर्यात 23 प्रतिशत था।

इसके अतिरिक्त, प्रौद्योगिक विकास भी तभी हो सकता है जब कृषि में समृद्धि हो या बहुत हुआ तो दोनों साथ-साथ हो सकते हैं। लेकिन औद्योगिक विकास पहले हो, बाद को कृषि में खुशहाली आये यह नहीं हो सकता।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जिस राजनीतिक दल ने देश पर तीस वर्ष तक शासन किया उसकी नेताशाही समझती थी, और शायद अभी तक समझती है, कि प्रौद्योगिक विकास पहले हो सकता है। जब कृषक के पास क्रय-शक्ति हो तभी प्रौद्योगिक व कृषीतर क्षेत्र के माल व सेवाओं (जैसे शिक्षा, परिवहन, विद्युत) की मांग पैदा हो सकती है। क्रय-शक्ति कृषि की उपज बेचकर ही उत्पन्न की जा सकती है। चाहे बिक्री देश में हो या देश के बाहर जितना अधिक बिक्री के लिए अतिरिकित उत्पादन होगा उतना ही बेचने वाले अथवा कृषि के उत्पादक की क्रय शक्ति बढ़ेगी

हो सकती है चाहे बिक्री देश में हो चाहे देश के बाहर। जितना अधिक बिक्री के लिए अतिरिक्त उत्पादन होगा, उतनी ही बेचने वाले अथवा कृषि के उत्पादक की क्रय शक्ति बढ़ेगी। जहाँ जनसाधारण की क्रय शक्ति नहीं बढ़ती, अर्थात् जहाँ कृषकों के उपभोग से अधिक अतिरिक्त उत्पादन नहीं होता, वहाँ कोई प्रौद्योगिक संवृद्धि नहीं हो सकती।

कृषि विकास से एक ओर तो जन-समुदाय को क्रय शक्ति मिलेगी जिससे वह तैयार माल व सेवाएँ खरीद सके, दूसरी ओर कामगारों को अवसर मिलेगा कि वे औद्योगिक तथा अन्य रोजगार कर सकें। जैसे-जैसे अधिकाधिक पूँजी लगने तथा उच्च से उच्चतम टेकनॉलॉजी के प्रयोग से प्रति एकड़ उत्पादकता बढ़ेगी, वैसे-वैसे उतनी ही भूमि पर उतनी ही उपज के लिए कामगारों की संख्या की आवश्यकता कम होती जायगी।

इसके अतिरिक्त छोटी-छोटी व अलाभकर जोतों के मालिक अधिक श्राय वाले कामों की तलाश में नये प्रौद्योगिक क्षेत्रों की ओर प्रवास करेंगे तो धीरे-धीरे ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जायेगी कि छोटी-छोटी जोतों की संख्या बढ़ना रुक जाय और अन्ततः ऐसी जोतें लुप्त हो जायें। जब तक कृषि से कामगारों को छुटकारा नहीं मिलता ताकि वे कृषीतर रोजगार में लग सकें तब तक देश में न तो आर्थिक विकास हो सकता है, न ग़रीबी मिट सकती है।

इसके कारण सीधे-सादे हैं। ऐसे पदार्थ कम हैं जिनको कृषि प्रथवा प्राथमिक क्षेत्र में पैदा किया जाता है और जिनको उसी कच्ची शक्ल में उपभोक्ता इस्तेमाल कर सके जैसे फल, दूध आदि। कृषि अथवा प्राथमिक क्षेत्र में जो कुछ उत्पादन होता है उसमें अधिकांश ऐसा होता है जिसे कृषीतर (द्वितीय व तृतीय) क्षेत्रों में प्रक्रमणित करके ही सभ्य मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति के लायक बनाया जा सकता है।

इसलिए यह स्पष्ट है कि कृषीतर (द्वितीय व तृतीय) क्षेत्रों में, अर्थात् कृषि उत्पादों के प्रक्रमण व कृषीतर वस्तुओं के उत्पादन और सेवाओं में लगे व्यक्तियों की संख्या जितनी अधिक होगी, उतना ही अधिक वह देश सम्पन्न होगा और उतना ही ऊँचा वहाँ के निवासियों का जीवन-स्तर होगा।

आँकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि उन सभी देशों में जो ग्राज समृद्ध हैं या प्रार्थिक दृष्टि से विकसित हैं, कामगार अधिकाधिक संख्या में कृषि को छोड़कर अन्य रोजगारों में लगते जा रहे हैं। नतीजा यह है कि कृषि में लगे कामगारों की संख्या का प्रतिशत बराबर घटता जा रहा है। आगामी पृष्ठों पर दी गयी तालिका में भारत व पन्द्रह अन्य देशों के श्रमिक बल के आंकड़े  दिये गये हैं।

कुछ देशों के प्राथमिक (प्रथम) कृषि क्षेत्र में लगे श्रमिक बल के भाग तथा प्रति व्यक्ति आय में विविधता

ऐतिहासिक आँकड़े (1880–1968)

कृषि में लगे श्रमिक बल (%) एवं प्रति व्यक्ति आय (डॉलर)
देश वर्ष कृषि में लगे
श्रमिक बल (%)
आय का
वर्ष
प्रति व्यक्ति आय
(डॉलर)
अमेरिका 1890 43.1 1884–93 355
1910 32.0 1904–13 508
1930 22.6 1930 648
1950 11.6 1950 1,064
1965 5.1 1965 2,921
आस्ट्रेलिया 1891 26.5 1891 405
1911 24.8 1913–14 414
1933 24.7 1933–34 441
1947 16.8 1947–48 664
1966 8.1 1966 1,747
ग्रेट ब्रिटेन
(आयरलैंड शामिल नहीं)
1871 15.0 1871 330
1891 10.4 1891 453
1911 7.8 1911 519
1951 4.5 1951 597
1966 2.7 1966 1,544
बेलजियम 1890 18.2 1895 219
1910 17.6 1913 314
1930 13.6 1930 324
1947 10.9 1947 481
1967 4.3 1967 1,593
कनाडा 1901 43.6 1900 408
1931 32.6 1931 432
1951 18.7 1951 834
1968 8.2 1968 2,247

 

ऐतिहासिक तुलना (1880–1967)
देश वर्ष कृषि श्रमिक
बल (%)
आय का
वर्ष
प्रति व्यक्ति आय
(डॉलर)
न्यूज़ीलैण्ड 1901 29.6 1901 334
1921 27.3 1925–26 590
1945 20.1 1945–46 739
1966 11.9 1966 1,750
फ्रांस 1901 33.1 1900 231
1921 28.5 1921 348
1931 24.5 1931 363
1951 20.2 1951 509
1954 19.8 1954 812
नीदरलैण्ड्स 1899 28.5 1900 329
1920 21.1 1920 366
1947 16.8 1947 434
जर्मनी
(1950 से प. जर्मनी)
1882 35.5 1883 206
1907 23.8 1907 298
1925 17.8 1925 274
1933 16.9 1933 295
1950 11.8 1950 360
प. जर्मनी 1967 4.9 1967 1,519
डेनमार्क 1901 42.4 1903 481
1921 31.7 1921 493
1940 23.6 1940 545
1960 16.4 1960 1,049
स्वीडन 1890 45.2 1891 145
1910 37.5 1913 229
1930 34.0 1930 463
1960 18.8 1960 964
जापान 1912 48.0 1913 146
1930 36.2 1930 189
1950 32.6 1950 194
1960 18.9 1960 343
1965 13.7 1965 721

 

भाग-3 : ऐतिहासिक तुलना
देश वर्ष कृषि श्रमिक
बल (%)
आय का
वर्ष
प्रति व्यक्ति आय
इटली 1901 48.9 1901 132 IU
1921 46.5 1921 146 IU
1936 40.3 1936 168 IU
1951 34.9 1951 250 IU
1967 17.7 1967 1,075 $
स्विट्जरलैण्ड 1900 27.0 1899 245 IU
1920 21.7 1924 346 IU
1941 19.9 1941 414 IU
1950 15.4 1950 638 IU
1960 10.4 1970 2,963 $
स्वीडन 1910 40.8 1910 252 IU
1930 30.5 1930 358 IU
1950 19.3 1950 625 IU
भारत 1881 74.4 1880 197 IU
1901 76.1 1900 199 IU
1951 77.4 1950 253 IU
1961 73.5 1961-62 309.2 IU
1971 72.05 1970-71 353.0 IU

स्रोत (भारत के अतिरिक्त अन्य देशों के लिए) :

  1. 1952 तक के आँकड़ों के लिए कोलिन क्लार्क लिखित
    कण्डीशन्स ऑफ इकनॉमिक प्रोग्रेस (1957 का संस्करण),
    1952 के बाद के लिए अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन के
    ILO Year Book of Labour Statistics, 1961, 1966 और 1968
    तथा UN Statistical Year Book, 1962
  2. 1952 तक प्रति व्यक्ति आय IU (International Unit) के अनुसार दी गयी है
    जो कि 1924-34 के दशक में अमेरिका में एक डालर के बदले में
    दिये जाने वाले माल के औसत के बराबर है।
    1952 के बाद यह डालर के चालू मूल्य में दी गयी है।

स्रोत (भारत के लिए):

1. 1881, 1901, 1951 और 1961 के लिए साइमन कुजनेत्स कृत Economic Growth of Nations, हारवर्ड यूनिवर्सिटी, 1971;
और 1971 के लिए India’s Census Report, 1971.

2. 1955 तक प्रति व्यक्ति आय 1948-49 की कीमतों पर (या 1948-49 में रुपये की क्रय-शक्ति के मूल्य के आधार पर)
दी गयी है और मोनी मुखर्जी की पुस्तक National Income of India: Trends and Structure,
स्टैटिस्टिकल पब्लिशिंग सोसाइटी, कलकत्ता, पृ० 61 से ली गयी है।

1961-62 की प्रति व्यक्ति आय के आँकड़े 1960-61 की कीमतों पर आधारित हैं और
National Accounts Statistics, सी० एस० ओ०, जी/आई, 1976 (अक्तूबर), तालिका 1, पृ० 2-3 से लिये गये हैं।

अगर हम चाहते हैं कि हमारा देश विकसित हो तो दो ही नुस्खे हैं

  1. प्रति एकड़ कृषि उत्पादकता बढ़े और साथ-साथ प्रति एकड़ काम करने वालों की संख्या घटे;
  2. हमारे राष्ट्रीय मनोभाव में इस अर्थ में परिवर्तन आये कि हम, विशेष रूप से हिन्दू, यह मानना छोड़ दें कि
    संसार तो माया है और व्यक्तिगत रूप से तथा एक राष्ट्र के नाते हमारे मन में यह आकांक्षा उत्पन्न हो जाय कि
    हमें अपनी आर्थिक स्थिति सुधारनी है और इसके लिए हमें पहले से अधिक मेहनत करनी है और पहले से अधिक अच्छे ढंग से काम करना है।

लेकिन ऊपर जिस दूसरे नुस्खे का उल्लेख किया गया है, उस पर यहाँ विचार करना नहीं है।

नेहरू यह तो ठीक कहते थे कि लोगों के रहन-सहन का स्तर ऊंचा उठाने के लिए भारत में प्रौद्योगीकरण अथवा कृषीतर साधनों का विकास आवश्यक है। लेकिन नेहरू ने ग़लती यह की कि सोवियत रूस की नक़ल करने की कोशिश में पहले भारी उद्योगों के विकास की नीति अपना ली जिससे हमारी अर्थव्यवस्था बर्बाद हो गयी।

जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, रहन-सहन का स्तर तभी ऊँचा होगा जब श्रमिक खेती से हटकर कृषीतर धंधों में लगें और यह तभी हो सकता है जब खेती का उत्पादन इतना बढ़े कि उत्पादकों की आवश्यकता से अधिक हो। इसका मतलब है कि अगर भारत को जिन्दा रहना है और आगे बढ़ना है, तो खेती से नहीं बचा जा सकताइसका मतलब यह समझना गलत होगा कि साथ-साथ देश में औद्योगीकरण के प्रयत्न छोड़ दिये जायें। बहुत हद तक कृषि और उद्योग एक-दूसरे के पूरक हैं। सवाल यह है कि किस पर बल दिया जाय, किसे प्राथमिकता दी जाय?

उद्योगपति और कुछ राजनीतिक नेता भी अक्सर इस सुझाव की हंसी उड़ाते हैं कि खेती के उत्पादन पर बल दिया जाय और उद्योगों को दूसरा स्थान दिया जाय। पूछा यह जाता है कि बिना औद्योगिक उत्पादन में अनुपातिक वृद्धि हुए कृषि का उत्पादन कैसे बढ़ सकता है? भूमि की सिंचाई के लिए हमें तालाब बनाने होंगे, नहरें बनानी होंगी, बिजली के कुओं की ज़रूरत होगी जिनके लिए हमें चाहिए सीमेंट, इस्पात, बिजली। कृषि व उद्योग की पारस्परिक निर्भरता को स्वीकार करते हुए भी उद्योगपति व सभी बुद्धिजीवी उद्योगों को या तो प्राथमिकता देते हैं, या उन पर बल देते हैं। उनकी दलील यह है कि बिना उन साधनों के जो केवल उद्योग मुहैय्या कर सकते हैं, कृषि के उत्पादन में वृद्धि की आशा करना ग़लत है।

यही दृष्टिकोण है जो भारत की आर्थिक बर्बादी के लिए जिम्मेदार है। वर्तमान आर्थिक नीति के समर्थकों से प्राथमिकता के प्रश्न पर असहमत होते हुए भी उनके इस कथन से इंकार नहीं किया जा सकता कि प्रौद्योगीकरण से कृषि की उत्पादकता बढ़ाने में सहायता मिलेगी, क्योंकि उपभोक्ता वस्तुओं (जैसे, कपड़ा, जूते, किताबें) की पूर्ति खेतिहर मजदूरों को अभिप्रेरणा पहुँचाने का काम करेगी और पूँजीगत वस्तुओं की पूर्ति (उदाहरण के लिए, उर्वरक के रूप में कार्य चालन पूँजी, लोहे के यन्त्रों तथा डीज़ल पम्पों के रूप में स्थिर पूँजी) एक प्रकार से भूमि को अभिप्रेरणा पहुँचाने का काम करेगी।

विकासोन्मुख उद्योगों से (व उसके साथ आवश्यक रूप से बढ़ते हुए वाणिज्य, परिवहन व अन्य सेवाओं से) खेती के उत्पादन के लिए मण्डी का विस्तार होगा क्योंकि शहरी आबादी और प्रक्रमण व विनिर्माण उद्योगों के लिए कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी और जब तक यह नहीं होता किसान अपनी आवश्यकता से अधिक खेती का उत्पादन नहीं बढ़ायेगा। औद्योगिक केन्द्रों में खेती की पैदावार की माँग बढ़ने से खेतिहरों की प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी।

लेकिन साथ ही यह भी मानना होगा कि कृषि के विकास से ही प्रौद्योगिक व अन्य कृषीतर श्रमिकों को खाद्यान्न मिलेंगे, उद्योगों को कच्चा माल मिलेगा, विदेशों से पूँजीगत माल मंगाने के लिए विदेशी मुद्रा मिलेगी, उद्योगों के उत्पाद के लिए घरेलू मण्डी बनेगी, और उद्योग, परिवहन व वाणिज्य के लिए श्रमिक मिलेंगे।

इसमें किसी को सन्देह नहीं है कि आज औद्योगिक विकास अथवा कृषीतर साधनों के विकास के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट कृषि उत्पादन की कमी ही बन गयी है। कृषि उत्पादन की कमी व घाटे की वित्त व्यवस्था के कारण कीमतें बहुत बढ़ गयी हैं, घरेलू मण्डी सिकुड़ गयी है, शहरों में बैचेनी बढ़ गयी है, जगह-जगह हड़ताल होने लगी हैं, मजदूरों का अनुशासन ढीला हो गया है। और पूँजी लगाने के लिए वातावरण दूषित हो गया है। कृषि व उद्योग, दोनों, एक-दूसरे के पूरक हैं।

एक-दूसरे के विकास के लिए कारण कारक हैं। जैसे जब उद्योग खुदाहाल होते हैं तो कृषि का विकास होता है और खेतिहरों में भी खुशहाली आती है, वैसे ही कृषि के विकास से उद्योग का भी विकास होगा व कृषीतर जनता खुशहाल होगी।

इसका यह मतलब भी नहीं कि उद्योग भी उतना ही महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है जितना कृषि। प्राथमिक भूमिका, अग्रगामी की भूमिका तो कृषि की ही है।

आदमी बिना औद्योगिक वस्तुओं के तो काम चला सकता है लेकिन बिना भोजन के जीवित नहीं रह सकता।

इसी प्रकार खेती तो अन्ततोगत्वा बिना भारी अथवा पूँजीगत उद्योग के हो सकती है, उद्योग बिना खेती के नहीं चल सकते। बिना सीमेंट, इस्पात व बिजली बड़ी मात्रा में मिले कुएँ, तालाब व नहरें तो बन सकते हैं और हमारे पूर्वजों ने तथा अंग्रेज़ों ने भी बनाये ही थे और कपड़ा, जूते व किताबें भी बन सकती हैं।

वैसे भी, उद्योग की अपेक्षा खेती में सीमेंट आदि माल का बहुत कम अंश इस्तेमाल होता है। जहाँ तक खाद का प्रश्न है, जैव उर्वरक अजैव उर्वरकों से कहीं ज़्यादा अच्छे होते हैं, उर्वरक इकट्ठा किये जा सकें और उनको तैयार किया जा सके जैसा कि चीन-निवासी पिछली चालीस शताब्दियों से करते आये हैं।

आर्थिक जीवन-क्षमता, घरेलू हो या विदेशी, कृषि की उपेक्षा करके प्राप्त नहीं की जा सकती।

और आर्थिक जीवन-क्षमता पर ही देश की राजनीतिक स्थिरता और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक महत्ता निर्भर है। हमारे पास-पड़ोस के छोटे-छोटे राज्य व हमारे परम्परागत मित्र हमें छोड़कर दूसरों की ओर सहायता व बचाव के लिए देख रहे हैं क्योंकि भारत स्वयं अपना काम नहीं चला पा रहा और खाद्य उत्पादन की विशाल सम्भावनाओं के होते हुए भी उसे खाद्यान्न का आयात करना पड़ता है।

जब से, 1947 में, भारत स्वतन्त्र हुआ है, दुनिया यह विचित्र तमाशा देख रही है कि अमेरिका जो प्रौद्योगिक दृष्टि से सबसे विकसित देश है भारत जैसे कृषि प्रधान देश को खाद्यान्न दे रहा है जहाँ कृषि के अन्तर्गत प्रयुक्त क्षेत्रफल के 75 प्रतिशत भाग पर खाद्यान्न की पैदावार होती है और जहाँ श्रमिक-बल में से 52.25 प्रतिशत लोग केवल खाद्यान्न की खेती में लगे हैं।

जैसे-जैसे समय बीतता जायगा, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में खाद्य-पदार्थों की भूमिका का महत्व बढ़ता जायगा। खाद्य निर्यात करने वाले देश खाद्य-पदार्थों को आयात करने वाले देशों के विरुद्ध एक राजनीतिक अस्त्र के तौर पर इस्तेमाल करेंगे।

इसलिए यदि भारत को जिन्दा रहना है और प्रगति करनी है तो उसे कृषि को सर्वप्रमुखता प्रदान करनी होगी।