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बंधुआ मजदूरी से मुक्ति की पहल अलमेलु बन्नन की प्रेरक यात्रा

महत्वपूर्ण तथ्य

  • 27 वर्षों में कुल 1856 परिवारों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त किया गया।
  • अलमेलु बन्नन की उम्र वर्तमान में 47 वर्ष है।
  • वे तमिलनाडु के सेलम जिले के एक दलित परिवार में जन्मीं।
  • 14 वर्ष की आयु में एक शिक्षक वेंकटासलम द्वारा स्कूल में प्रवेश मिला।
  • उन्होंने Cooperative Management में डिप्लोमा और B.Com की पढ़ाई की।
  • उनका संगठन Rural Women Development Trust 74 गांवों में सांध्य स्टडी सेंटर चलाता है।
  • अब तक 1580 महिलाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया।
  • 4120 महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने में मदद की गई।
  • कभी बंधुआ मजदूर रहीं 62 महिलाएं आज उद्यमी बन चुकी हैं।
  • 2600 दलित-आदिवासी बच्चों को स्कूल भेजने में सफल रहीं।

बंधुआ मजदूरी से मुक्ति की पहल: अलमेलु बन्नन की प्रेरक यात्रा

तमिलनाडु के सेलम जिले की एक साधारण दलित परिवार में जन्मी अलमेलु बन्नन (Alamelu Banna) का  बचपन खेतों में बीता। पूरा परिवार सुबह साढ़े चार बजे से रात दस बजे तक काम किया करता था। बदले में मिलती थी सिर्फ दो वक़्त की रोटी, जिससे पेट पूरा भर पाना मुश्किल होता था। यह वही दौर था, जब वे और उनके परिवार के अनेक लोग Bonded Labour यानी बंधुआ मजदूरी की कठिनाईयों में बंधे हुए थे।

अलमेलु बन्नन अपने उस समय को याद करती हैं और बताती हैं कि उन्होंने जीवन के ढाई वर्ष ऐसे ही बिताए। लेकिन 14 वर्ष की उम्र में उनकी जिंदगी ने मोड़ लिया। एक संवेदनशील शिक्षक वेंकटासलम ने उनके परिवार को इस स्थिति से बाहर निकाला और उन्हें स्कूल में प्रवेश कराया। पढ़ाई ने उन्हें एक नई दिशा और सोच दी। उन्होंने बंधुआ मजदूर अधिनियम 1976 के उद्देश्यों की प्राप्ति केतु प्रयास किया।

शिक्षा ने दिखाई नई राह

स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद अलमेलु बन्नन ने Cooperative Management में डिप्लोमा और उसके बाद B.Com की शिक्षा हासिल की। पढ़ाई ने न केवल उन्हें ज्ञान दिया, बल्कि उन्हें समाज में मौजूद असमानताओं और संवेदनशील मुद्दों को गहराई से समझने का अवसर भी दिया। वे अपने पुराने अनुभवों को भुला नहीं सकीं और उन्होंने निर्णय लिया कि वे स्वयं उन परिवारों को इस स्थिति से बाहर निकालने का प्रयास करेंगी, जो कभी उनकी ही तरह बंधुआ मजदूर बनने को मजबूर थे।

Rural Women Development Trust की स्थापना

अलमेलु बन्नन ने अपने प्रयासों को संगठित रूप देने के लिए Rural Women Development Trust की स्थापना की। इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले उन परिवारों को शिक्षा, प्रशिक्षण और रोजगार के साधन उपलब्ध कराना है, जो अक्सर आर्थिक और सामाजिक कारणों से शिक्षा और विकास के अवसरों से दूर रह जाते हैं।

74 गांवों में सांध्य स्टडी सेंटर

इस ट्रस्ट के माध्यम से आज तमिलनाडु के 74 गांवों में Evening Study Centers चल रहे हैं। इन केंद्रों में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को शिक्षा और सहायता दी जाती है। उद्देश्य यह है कि कोई व्यक्ति अनपढ़ न रहे और अपनी मेहनत से अपना जीवन जी सके ताकि भविष्य में कोई व्यक्ति मजबूरी में बंधुआ मजदूर न बने।

महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास

ट्रस्ट द्वारा अब तक 1580 महिलाओं को Vocational Training दी जा चुकी है। इनमें रस्सी बनाना, सिलाई-कढ़ाई, पशुपालन जैसे कौशल शामिल हैं। इन प्रशिक्षित महिलाओं में से 4120 महिलाओं को रोजगार से जोड़ा गया है। सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि कभी बंधुआ मजदूर रहीं 62 महिलाएं अब स्वयं उद्यमी बन चुकी हैं और अपना काम चला रही हैं।

इन महिलाओं में से एक मथम्मल बताती हैं कि 14 वर्ष पहले अलमेलु अम्मा ने उन्हें बंधुआ मजदूरी से मुक्त करवाया और उन्हें रस्सी बनाने की कला सिखाई। आज उनका खुद का यूनिट है जहां 14 महिलाएं काम करती हैं। वे प्रतिदिन 1000 से 1300 रुपये कमाती हैं और उनका बेटा अब Architect बन चुका है।

2600 बच्चों के जीवन में उजाला

अलमेलु बन्नन की कोशिशों ने 2600 दलित और आदिवासी बच्चों को स्कूल तक पहुंचाया। यह संख्या केवल शिक्षा का आंकड़ा नहीं है, बल्कि वही रोशनी है जिसकी वजह से आगे आने वाली पीढ़ियां बंधुआ मजदूरी के दलदल से दूर रहेंगी।

अलमेलु अम्मा की यह यात्रा परिश्रम, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी के गहरे भाव का उदाहरण है। यह कहानी बताती है कि परिवर्तन केवल विचार से नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास, धैर्य और साहस से होता है।