बात साल 1996 की है जब मैंने यूनिवर्सिटी कालेज रोहतक में B.Sc. फाइनल इयर का छात्र होता था। दशहरा बीत चुका था, दीपावली समीप थी, तभी एक दिन कुछ युवक-युवतियों की एक टोली हमारे कॉलेज में घूम रही थी और सवाल पूछने लग रही थी। उन्होंने पूछा, “जब दीपावली भगवान राम के 14 वर्षो के वनवास से अयोध्या लौटने के उत्साह में मनाई जाती है, तो दीपावली पर “लक्ष्मी पूजन” क्यों होता है? श्री राम की पूजा क्यों नही?” प्रश्न पर सन्नाटा छा गया क्योंकि सभी मैकाले के एजुकेशन सिस्टम में पढ़े हुए थे। ब्राह्मण देवता की संगत का लाभ किसी के पास नहीं था, तभी सभी एक दूसरे की ओर ताकने लग रहे थे।
मन ही मन युवक युवतियों की टोली मुस्कुरा रही थी क्यूंकि वो जो करने आये थे वो होता हुआ दीख रहा था। तभी उनका सामना मेरे से हुआ और वही सवाल उन्होने मेरे से भी पूछा तब मैंने कहा भाई ध्यान से सुनो “दीपावली उत्सव दो युग “सतयुग” और “त्रेता युग” से जुड़ा हुआ है। “सतयुग में समुद्र मंथन से माता लक्ष्मी उस दिन प्रगट हुई थी! इसलिए “लक्ष्मी पूजन” होता है। भगवान श्री राम भी त्रेता युग मे इसी दिन अयोध्या लौटे थे! तो अयोध्या वासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था! इसलिए इसका नाम दीपावली है।
फिर वहां जो साथी खड़े थे उनके मन में क्यूरोसिटी के कीड़े जागृत हो गए और उन्होंने मेरे से सवाल पूछा कि लक्ष्मी और श्री गणेश का आपस में क्या रिश्ता है? और दीपावली पर इन दोनों की पूजा क्यों होती है? फिर मैंने उन्हें समझाया। लक्ष्मी जी जब सागर मन्थन में मिलीं और भगवान विष्णु से विवाह किया तो उन्हें सृष्टि की धन और ऐश्वर्य की देवी बनाया गया! … दीपावली आती है कार्तिक अमावस्या को! भगवान विष्णु उस समय योगनिद्रा में होते हैं! वे जागते हैं ग्यारह दिन बाद, देव उठावनी एकादशी को। माँ लक्ष्मी को पृथ्वी भ्रमण करने आना होता है शरद पूर्णिमा से दीवाली के बीच के पन्द्रह दिनों में तो वे संग ले आती हैं श्री गणेश जी को! इसलिए दीपावली को लक्ष्मी-गणेश की पूजा होती है।