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सरदार पटेल: भारत की एकता के शिल्पी का अविस्मरणीय योगदान

भारत के इतिहास में सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम उस व्यक्तित्व के रूप में दर्ज है जिसने रियासती भारत को एकजुट कर एक सशक्त और संगठित राष्ट्र का स्वरूप दिया। उन्हें अक्सर जर्मनी के बिस्मार्क की तरह देखा जाता है, क्योंकि उन्होंने ऐसे समय में देश को जोड़ने का कार्य किया जब स्वतंत्रता के बाद भारत कई टुकड़ों में विभाजित था।

31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में जन्मे पटेल साधारण पृष्ठभूमि से आगे बढ़ते हुए स्वतंत्र भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने। आजादी के तुरंत बाद अंग्रेजों के प्रस्थान से उत्पन्न अस्थिर स्थिति में उन्होंने रणनीतिक निर्णय क्षमता और अटूट इच्छाशक्ति का परिचय दिया। उनकी दृढ़ नीति के परिणामस्वरूप 560 से अधिक रियासतों ने भारतीय संघ में शामिल होकर नवगठित राष्ट्र को बिखराव से बचाया।

यदि उस समय पटेल न डटे होते, तो भारत आज कई अलग-अलग जागीरों और प्रतिस्पर्धी प्रांतों में बंटा होता, न कि एक एकीकृत संप्रभु राष्ट्र। उनकी यह भूमिका भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक कदमों में से एक मानी जाती है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को नडियाद, गुजरात में हुआ।
  • वे भारत के पहले उप प्रधानमंत्री और पहले गृह मंत्री थे।
  • पटेल ने स्वतंत्रता के बाद 560 से अधिक रियासतों को भारतीय संघ में एकीकृत किया।
  • पटेल की दृढ़ नीति और पुलिस कार्रवाई की भूमिका ने रियासतों को भारत में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया।
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी 150वीं जयंती पर स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर पुष्पांजलि अर्पित की।
  • राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने पटेल को एक दूरदर्शी राष्ट्र निर्माता के रूप में वर्णित किया।
  • पटेल का दृष्टिकोण व्यावहारिक प्रशासन, राष्ट्रीय सुरक्षा और मजबूत शासन पर आधारित था।
  • पटेल और नेहरू के विचारों में अंतर था, फिर भी उनकी भूमिकाएं एक-दूसरे के पूरक थीं।
  • स्टैच्यू ऑफ यूनिटी दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है।

पटेल और नेहरू: दृष्टिकोण में अंतर, लक्ष्य एक

अक्सर सरदार पटेल और जवाहरलाल नेहरू की तुलना की जाती है। नेहरू जहां एक आदर्शवादी और अंतर्राष्ट्रीयवादी दृष्टि से भारत को देख रहे थे, वहीं पटेल का नजरिया व्यावहारिक और प्रशासन (Administration) तथा राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security) पर केंद्रित था।

यह कहा जाता है कि दोनों में मतभेद थे, लेकिन वास्तविकता यह है कि दोनों की भूमिकाएं पूरक थीं। नेहरू ने देश को एक वैचारिक दिशा दी, जबकि पटेल ने उस दिशा को लागू करने का ठोस ढांचा तैयार किया।

इतिहास में छवि और हालिया पुनर्स्थापन

स्वतंत्रता के बाद के दशकों में पटेल की छवि अक्सर पाठ्यपुस्तकों और सीमित चर्चा तक सीमित रही। लेकिन हाल के वर्षों में उन्हें एक मजबूत और निर्णायक नेतृत्व के प्रतीक के रूप में पुनः स्थापित किया गया है।

गुजरात के केवडिया में स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, जो विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है, पटेल की विरासत को नए रूप में याद करने का उदाहरण है। हालांकि इस पुनर्स्थापन में राजनीतिक दृष्टिकोणों और व्याख्याओं पर भी बहस होती रही है।

यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि पटेल धार्मिक रूप से धर्मनिरपेक्ष (Secular) विचारधारा के समर्थक और एक दृढ़ कांग्रेसी नेता थे। उनकी राजनीति सम्मिलित नेतृत्व और लोकतांत्रिक सहमति पर आधारित थी।

निष्कर्ष

सरदार वल्लभभाई पटेल केवल एक नेता नहीं थे, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया के मूल स्तंभ थे। भारत की एकता, स्थिरता और प्रशासनिक ढांचे के निर्माण में उनका योगदान आज भी राष्ट्रीय पहचान का आधार है।

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