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राष्ट्रीय जलमार्ग और भारत का आधुनिक लॉजिस्टिक्स तंत्र

महत्वपूर्ण तथ्य

  • भारत में अंतर्देशीय जल परिवहन की मात्रा 2013-14 में 18.1 मिलियन मीट्रिक टन थी, जो 2024-25 में बढ़कर 145.84 मिलियन मीट्रिक टन हो गई।
  • जलमार्ग परिवहन लागत लगभग 1.20 रुपये प्रति किमी, रेल 1.40 रुपये प्रति किमी और सड़क 2.28 रुपये प्रति किमी।
  • ईंधन खपत: जलमार्ग में प्रति किमी केवल 0.0048 लीटर, सड़क में 0.0313 लीटर और रेल में 0.0089 लीटर।
  • कार्बन उत्सर्जन: नदी परिवहन सड़क परिवहन की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत।
  • राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर वाराणसी और साहिबगंज मल्टीमोडल लॉजिस्टिक हब विकसित किए जा रहे हैं।
  • राष्ट्रीय जलमार्ग-2 ब्रह्मपुत्र नदी पर विकसित हो रहा है।
  • भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग के माध्यम से नुमालीगढ़ रिफाइनरी परियोजना के उपकरण सुरक्षित रूप से भेजे गए।
  • भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।

एक ऐसे भविष्य की कल्पना करें जहाँ माल ढुलाई मुख्य रूप से नदियों के रास्ते होती हो, तटों पर आधुनिक लॉजिस्टिक संरचनाएँ स्थापित हों और भारी माल-संचालन के बावजूद पर्यावरण पर भार कम पड़ता हो। यह कल्पना अब भारत की परिवहन रणनीति का यथार्थ बन चुकी है, जहाँ अंतर्देशीय जल परिवहन धीरे-धीरे लॉजिस्टिक्स के केंद्र में आ रहा है।

भारत का नदी-आधारित व्यापार का पुराना इतिहास

भारत में नदियों के माध्यम से व्यापार करने की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। नदियों ने स्थानीय शहरों को दूरस्थ क्षेत्रों और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक केंद्रों से जोड़ा था। समय के साथ, रेल और सड़क परिवहन के विस्तार ने नदी-आधारित ढुलाई को पीछे कर दिया, परंतु अब जलवायु परिवर्तन और आर्थिक दबाव के कारण यह माध्यम फिर से महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

कम लागत और बेहतर ऊर्जा दक्षता

परिवहन लागत की तुलना करने पर जलमार्ग स्पष्ट रूप से अधिक किफायती दिखते हैं। जल-मार्ग में प्रति किलोमीटर परिवहन लागत लगभग 1.20 रुपये है, जबकि रेल में 1.40 रुपये और सड़क में 2.28 रुपये तक खर्च आता है। इसी प्रकार ईंधन की खपत भी जलमार्ग में सबसे कम है।

कार्बन उत्सर्जन में उल्लेखनीय कमी

नदी परिवहन प्रदूषण के मामले में भी लाभकारी है। सड़क परिवहन की तुलना में प्रति किमी केवल लगभग 20 प्रतिशत उत्सर्जन होता है। इस प्रकार जल परिवहन केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, पर्यावरणीय दृष्टि से भी उपयोगी विकल्प है, विशेषकर भारत के नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य की दिशा में।

प्रमुख परियोजनाएँ और अवसंरचना विकास

राष्ट्रीय जलमार्ग-1 पर गंगा-भागीरथी-हुगली  नदी तंत्र में माल ढुलाई क्षमता को बढ़ाने के लिए मल्टीमोडल टर्मिनल विकसित किए जा रहे हैं। वाराणसी और साहिबगंज जैसे केंद्र सड़क और रेल नेटवर्क से जोड़े जा रहे हैं।

राष्ट्रीय जलमार्ग-2, ब्रह्मपुत्र नदी पर, पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों को मजबूत व्यापारिक कनेक्टिविटी प्रदान कर रहा है। भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल मार्ग के माध्यम से माल की आवाजाही ने इस क्षमता को और बढ़ाया है।

नुमालीगढ़ रिफाइनरी का उदाहरण

हाल ही में नुमालीगढ़ रिफाइनरी विस्तार परियोजना के लिए भारी मशीनरी जलमार्ग से सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से पहुंचाई गई। इस मार्ग ने सड़क परिवहन की जटिलताओं और लागत को कम किया और लॉजिस्टिक दक्षता को प्रमाणित किया।

स्थानीय समुदायों और पर्यावरण के लिए लाभ

जलमार्ग के उपयोग से सड़कों पर भार कम होता है, जिससे सड़क रखरखाव लागत में कमी आती है और वायु गुणवत्ता में सुधार होता है। नदी तटों पर रहने वाले समुदायों को भी रोजगार और आजीविका के नए अवसर मिल रहे हैं।

चुनौतियाँ और समाधान

कुछ क्षेत्रों में नदी की गहराई में मौसमी बदलाव होते हैं और बेड़े की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार दिशा-निर्देश, प्रशिक्षण और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा दे रही है।

निष्कर्ष

राष्ट्रीय जलमार्ग केवल परिवहन का विकल्प नहीं, बल्कि एक समग्र लॉजिस्टिक और पर्यावरणीय समाधान है जो आर्थिक विकास, रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण तीनों को साथ लेकर चलता है। भारत अंतर्देशीय जल परिवहन के माध्यम से एक टिकाऊ और सशक्त भविष्य की ओर अग्रसर है।

 

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