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दादाभाई नौरोजी: भारत में जागरण की नैतिक अंतरचेतना

महत्वपूर्ण तथ्य

  • दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर 1825 को बंबई के एक पारसी परिवार में हुआ।
  • वे एलफिंस्टन कॉलेज में पहले भारतीय प्रोफेसरों में से एक थे।
  • उन्होंने 1851 में गुजराती द्वैमासिक (Rust Goftar) की स्थापना की।
  • नौरोजी द्वारा प्रस्तुत धन निकास सिद्धांत (Drain Theory) ने ब्रिटिश शासन की आर्थिक शोषण प्रणाली को उजागर किया।
  • वे ब्रिटिश संसद में चुने जाने वाले पहले भारतीय थे (1892, Central Finsbury सीट से)।
  • उन्होंने स्वराज (Self-Government) की मांग को सबसे पहले स्पष्ट रूप से व्यक्त किया।
  • नौरोजी महिलाओं की शिक्षा, जातिगत भेदभाव और सामाजिक सुधार के कट्टर समर्थक थे।

दादाभाई नौरोजी: भारत में जागरण की नैतिक अंतरचेतना

इतिहास कभी-कभी उन व्यक्तियों को विशेष स्थान देता है, जो कमजोरों की आवाज बनते हैं, भले ही उनके विचार अपने समय में सहज रूप से स्वीकार न किए गए हों। दादाभाई नौरोजी ऐसे ही व्यक्तित्व थे, जिनका जीवन भारत की राष्ट्रीय चेतना के उदय और आधुनिक आर्थिक राष्ट्रवाद की नींव का प्रतीक है।

शिक्षा से सुधार की ओर यात्रा

1825 में बंबई के एक साधारण पारसी परिवार में जन्मे नौरोजी ने कम उम्र में विवाह तो कर लिया, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने (Elphinstone College) में शिक्षा पूरी कर उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। वे वहां पहले भारतीय गणित के प्रोफेसरों में शामिल हुए, जिसने औपनिवेशिक शासन द्वारा बनाए गए नस्लीय पदानुक्रम को चुनौती दी।

सामाजिक सुधार और जनचेतना

1851 में उन्होंने गुजराती पत्र (Rust Goftar) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य सामाजिक सुधार, महिलाओं की शिक्षा और गरीबों के अधिकारों पर संवाद शुरू करना था। इसने न केवल पारसी समाज बल्कि पूरे शहरी भारत में एक नए बौद्धिक वातावरण को जन्म दिया।

धन निकास सिद्धांत: औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था का पर्दाफाश

उनका सबसे प्रसिद्ध योगदान धन निकास सिद्धांत (Drain Theory) था। उन्होंने स्पष्ट आँकड़ों और व्यापारिक आंकड़ों के आधार पर दिखाया कि भारत की गरीबी जन्मजात नहीं, बल्कि ब्रिटिश शासन द्वारा किए गए संगठित आर्थिक शोषण का परिणाम थी।

उनके अनुसार, अत्यधिक कराधान, सैन्य खर्च और भारतीयों से एकत्रित धन का ब्रिटेन भेजा जाना ही भारतीय निर्धनता का प्रमुख कारण था। यह विचार बाद में भारत की स्वतंत्रता की बौद्धिक नींव बना।

ब्रिटिश संसद में भारतीय आवाज

1892 में दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य चुने गए। यह घटना केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि एक नैतिक विजय थी। एक उपनिवेशित देश का प्रतिनिधि अब साम्राज्य की केंद्र सत्ता में भारतीय नागरिकों के लिए न्याय की बात कह रहा था।

स्वराज की अवधारणा और राष्ट्रीय आंदोलन

स्वराज (Self-Rule) की मांग को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने वाले वे पहले व्यक्ति थे, बहुत पहले कि यह लोकनायक तिलक और महात्मा गांधी के दौर में राष्ट्रव्यापी नारा बने।

एक दूरदर्शी विचारक की स्थायी विरासत

नौरोजी ने महिलाओं की शिक्षा, बाल विवाह के विरोध और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाई। उनका विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, शिक्षा और सामाजिक समता के माध्यम से संभव है।

आज जब विश्व उपनिवेशवाद की आर्थिक और नैतिक लागतों पर पुनर्विचार कर रहा है, नौरोजी की विचारधारा और अधिक प्रासंगिक हो गई है। उनकी दृष्टि ने भारत को न केवल स्वतंत्रता के लिए प्रेरित किया, बल्कि उसे नैतिक सोच और आर्थिक न्याय की स्थायी भाषा भी दी।

निष्कर्ष

दादाभाई नौरोजी केवल एक विचारक नहीं थे; वे भारतीय आर्थिक राष्ट्रवाद के आधार स्तंभ और सामाजिक चेतना के पथप्रदर्शक थे। उनका योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बौद्धिक आत्मा का मूल बनकर आज भी जीवित है।

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