डोभ वाली क्रिएटिव दादी गंगा देवी

दादी गंगा देवी जी के साथ गांव डोभ जिला रोहतक हरियाणा में

मेरे जीवन मे जब जब ज्ञान से अपनी जीने की राह निकालने का सवाल आता है तो सबसे ऊपर दादी गंगा देवी जी का नाम आता है।

दादी गंगा देवी ने बचपन मे खेतों में काम करते करते स्कूल के आते जाते बच्चों के साथ खेल खेल कर गिनती पहाड़े सीख लिए,बिल्कुल अनपढ़ होने के बावजूद कैलकुलेशन में एक दम परफेक्ट थी।

इनका विवाह रोहतक जिले के डोभ गांव में श्री होशियार सिंह हुड्डा जी के साथ हुआ , दादी बताती हैं के थारा दादा पाली था और उसने हिसाब किताब का किमे ज्ञान न था, सारा हिसाब किताब और लेण देन का काम मेरे जिम्मे था मैं सारा लेखा जोखा जबानी राख्या करदी और कदे भी जिंदगी में एक बार भी गलती न होई।

दादी बताती हैं के उनके घर मे गुजारे लायक पैसे होते थे उनका परिवार खेतों में मेहनत करता था, गांव में जो शादी ब्याह होते थे उसमे लेण देन का चलन धीरे धीरे बढ़ने लग गया तो सामाजिक दबाव इनके परिवार के ऊपर महसूस होने लग गया।

दादी गंगा देवी जी ने एक युक्ति निकाली, उन्होंने अपनी सूझ बूझ से पर्स का डिज़ाइन तैयार किया जिसे उन्होंने किरोशिये पर बुनना शुरू किया, बुनते बुनते उन्होंने सोचा के पर्स ऐसा बनाया जाए जिसे खोलने में दिमाग लगाना पड़े।

उन्होंने एक ऐसा डिज़ाइन तैयार कर लिया जिसमे पर्स खोलने के लिए धागों के डिज़ाइन में एक युक्ति लगानी पड़ती थी। यानी आप जितना धक्का करेंगे पर्स उतना टाइट हो जाएगा।

ऊन के पर्स को हाथ मे लेकर आप छू तो पाएंगे के इसके अंदर नोट भी हैं और सिक्के भी हैं लेकिन आप उन्हें निकाल नही पाएंगे।

दादी गंगा देवी जी गांव में होने वाली शादी में जा कर कन्या को कुछ पैसे उस पर्स में डाल कर दे आती थी और साथ में चैलेन्ज भी दे आती थी के अपने ससुरालियों का दिमाग चेक करना और उन्हें कहना के इस बटुए में से पैसे निकाल कर दिखाएं।

दादी गंगा देवी का बटुआ एक कौतूहल का विषय बन जाता और पिछले 60 सालों में सैंकड़ो लड़कियों की ससुराल में दादी गंगा देवी जी का चैलेन्ज गया हुआ है और कोई भी व्यक्ति इसे खोलने में कामयाब नही हुआ है उसे खोलने के लिए एक ट्रिक सीखनी पड़ती है।

धक्का करने पर यह पर्स और अधिक टाइट होता चला जाता है।

दादी गंगा देवी जी ने कम बजट में अपना स्टेटस अपने ज्ञान और कौशल के दम पर स्थापित किया हुआ है। गांव की लड़कियां अपनी शादी से पूर्व ही दादी को डिमांड दे आती हैं और दादी की प्रतिष्ठा आज अस्सी साल की उम्र में भी स्थापित है।

एक आर्थिक संसाधनों में पिछड़ा जीव अपने ज्ञान और कौशल के दम पर समाज मे अपनी जगह बना सकता है, दादी गंगा देवी जी इसका जीता जागता उदहारण हैं।

दादी गंगा देवी जी एक बार मेरे साथ दिल्ली स्थित श्रीराम कालेज ऑफ कॉमर्स में गयी और वहां स्टूडेंट्स को अपने पर्स से मेंटल चैलेंज दे कर आई।

एक बार मैं दादी को एक कॉर्पोरेट प्रेजेंटेशन में भी लेकर गया जहां दादी ने नए उभरते हुए इंट्रप्रेन्युर्स को अपने जीवन की संघर्ष गाथा सुना कर प्रेरित किया।

एक भी सवाल ऐसा नही था जिसका जवाब देने में दादी गंगादेवी ने आधा मिनट भी लगाया हो। यह सब वो अपने जीवन मे अपने द्वारा अर्जित अनुभवों के आधार पर कर पाई।